शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

विवेकी राय का समर शेष है


विवेकी राय का समर शेष है
 विवेकी राय

        विवेकी राय की पहली प्रकाशित पुस्तक ‘अर्गला’ (1951) कविता संग्रह है। परिस्थितिवश कविता के बीच से उपजता गद्य लेखक आगे बढ़ते हुए हिंदी साहित्य की अमूल्य सेवा करता है। पत्रकार और अध्यापक रहे विवेकी राय का अनुभव जगत् अभिव्यक्ति पाकर हिंदी साहित्य में साकार हो उठा है। भोजपुरी के प्रति विशेष प्रेम होने के कारण उस भाषा में भी उन्होंने कई किताबों का सृजन किया है। गांव उनका आत्मीय रहा है। अतः उन्होंने गांव की गलियों में घूमते हुए विषयों को उठाकर एक से बढ़कर एक साहित्यिक कृतियों की निर्मिति की है आगे पढ़ें: रचनाकार: विजय शिंदे का आलेख - विवेकी राय का समर शेष है

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

किसनगढ़ के शोषण परंपरा की शिनाख्त





                   सृजनकर्ता सृजन क्यों करता है? साहित्य का उद्देश्य क्या है? यश, कीर्ति, मनोरंजन, रुपए कमाना, समाजहित करना या और कोई? अब साहित्य का क्षेत्र सीमित नहीं रहा है, उसमें परिवर्तन हो गए हैं। अनेक विधाएं और विधाओं के अंतर्गत कई प्रकारों में लेखन हो रहा है। उपन्यास विधा में चर्चित बना प्रकार आंचलिक उपन्यास। पाठक, समीक्षक के साथ हर एक को आह्वान करता आंचलिक उपन्यास। इसे बांचना, गुत्थियां सुलझाना, उद्देश्य को पकड़ना, लेखकीय पीड़ा की व्याख्या करना, भाषा के सौंदर्य का विश्लेषण करना, पात्रों के आत्मा की गुंज सुनना... आदि-आदि ‘चैलेंज’ बनकर अंतरबाह्य झकझोर देता है। वर्तमान हिंदी साहित्यकारों में, लेखन करने वाले आंचलिक लेखकों में अग्रणी लेखक के रूप में संजीव को पहचाना जाता है। इनका प्रत्येक उपन्यास आंचलिकता के अनछुए विषयों को लेकर उठता है और उस संसार की विड़ंबनाएं सामने रखता है। यह विड़ंबना उस गांव, आंचल, प्रदेश या किसी विशिष्ट क्षेत्र की होती है परंतु लेखकीय (आंचलिक लेखकों की) विशेषता यह होती है कि वह सीमित होकर व्यापक दर्शन कराती है। कृष्ण ने कुरुक्षेत्र पर खड़े होकर अर्जुन को विराट दर्शन कराए थे। आज प्रत्येक आंचलिक लेखक जीवन की दुर्गम युद्धभूमि पर खड़ा होकर मनुष्य के कई रूपों के दर्शन कराकर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। संजीव भी ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास से ‘देखिए, सोचिए और चेतिए का आह्वान’ करते हैं। आगे पढ़ें: रचनाकार: पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी

शनिवार, 16 अगस्त 2014

अपने घर से लौटते समय

मंथन
अपने घर से लौटते समय

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(प्रस्तुत आलेख लेखनी ई-पत्रिका के मंथनःडॉ. विजय शिंदे | लेखनी/ lekhni अगस्त ...2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है। पूरा आलेख यहां पर दे रहा हूं।)

          वर्तमान सामाजिक ढांचा जिस गति के साथ परिवर्तित हो रहा है उससे अचंभा होता है। यहां ‘परिवर्तित’ शब्द का जानबूझकर इस्तेमाल किया है। दूसरे शब्दों में अगर इसे कहा जाए तो बिखर रहा है, टूट रहा है कहा जा सकता है; जो सामाजिक ढांचे की गिरावट को दिखाता है। आधुनिकता और प्रगति के चलते पुराने ढांचे में जबर्दस्त परिवर्तन हो रहा है। नवीन जरूरतें, नवीन मांगें और आवश्यकताओं के चलते पुराने का बकर्रार रहना बिल्कुल संभव नहीं है। आज हम जिस मकाम पर खड़े हैं वहां से वापस मूड़कर एक नजर डाले, थोड़ा-सा लौटकर हम देखें कि कुछ दिन पहले, कुछ साल पहले, कुछ सदियों पहले हम कहां थें? तो हम चकित हो जाएंगे। कारण हमने इंसान होने के नाते जिन उंचाइयों को छुआ है उससे अचंभित होना लाजमी है। लेकिन यह देखकर भी दुःखी होते हैं कि इंसान होने के नाते पारिवारिक ढांचा, रिश्ते-नातों के नाजुक जुड़ाव को यह आधुनिकता का जामा कमजोर करते गया है। मूल कारण आधुनिकता और इसके साथ अन्य अनेक छोटे-बड़े उपकारणों से मनुष्य जीवन के भीतर अनेक परिवर्तन हो चुके हैं, जिससे व्यक्ति के रिश्तों के धागों में कमजोरी पैदा हो गई है। एक रूखापन-सा आ गया है। भौतिक. भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक… अंतर इतना बढ़ गया है कि इंसान को पता ही नहीं चला कि हम इतने दूर कब और कैसे चले आए। इस पीड़ा से बाहर निकलने के लिए और दुबारा इन रिश्तों को जोड़ने के लिए प्रयास करना जरूरी है। आधुनिकता की अच्छाइयों के स्वीकार के साथ नुकसानदेह बातों को छोड़कर पुराने रिश्तों के धागों को मजबूत करना भी जरूरी है। जंगल के भीतर कोई व्यक्ति अपना रास्ता भटक जाए तो दुबारा रास्ता पाने के लिए उसे उस जगह पर लौटना जरूरी होता है जहां से उसने वापसी के लिए शुरुआत की थी। वापसी के ‘की पॉईंट’ को पाया कि वह संभव है बाहर आने का मार्ग भी पाए। विकास के चलते बढ़ता शहरीकरण और टूटते गांव, बिखरते रिश्ते, किसी जंगल में भटके यात्री से कम नहीं है। गांवों में हाथ-पैर मारने पर भी आम आदमी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने के यथार्थ से जब परिचीत होता है तब मजबूरन गांव को छोड़ देता है और शहर की ओर भागना शुरू कर देता है। उसके मन में भागम्-भाग से एक कचोट निर्माण होती है कि ‘मैं मेरी आत्मा को मारकर निकल रहा हूं।’ क्या कभी उसकी आत्मा जीवित हो सकती है? उसका वापस लौटना संभव है? या युं कहे कि शहर में जो मौके हैं वे गांव के लोगों को गांव में ही मिल सकते हैं। या गांव पूरी तरह युवकों के बिना बूढ़ों के साथ जीने के लिए शापित रहेंगे और बूढ़ों के चल बसने के बाद बिल्कुल विरान हो जाएंगे?
अचानक मन में यह विचार क्यों निर्माण हो गए भाई? …मन के अंदर से एक आवाज उठती है कि – अचानक कैसे? बार-बार तो इन परिस्थितियों से तुम गुजरते हो। कभी ध्यान नहीं दिया, कभी ध्यान दिया तो लताड़कर उसे दूर भगा दिया। शहर जाए तो गांव, घर, घर के लोग, वहां का परिवेश, गाय, भैस, बकरियां, चिड़ियां, वहां की ताजी हवा, हरियाली, पेड़-पौधें, घास, पानी के झरने, गर्मी, कभी सूखा, धूप… क्या-क्या नहीं छोड चले। गांव का इंसान शहर, शहर का बड़े शहर और बड़े शहरों का विदेशों में जा रहा है। नवीन तंत्रज्ञान के चलते यह कड़ियां टूट चुकी हैं, अतः प्रत्येक पढ़ा-लिखा बड़े शहरों और विदेशों में जाने की मंशा रखता है। लेकिन जब भी कभी वह छुट्टियों (दो-चार दिन की हॉटेलिंग या पिकनिक!) के लिए गांव लौटने लगता है तब उसकी पुरानी यादें ताजा होने लगती हैं। त्रिलोचन की कविता ‘घर वापसी’ में इसका मार्मिक वर्णन है –

          “घंटा गुजर गया, तब गाड़ी आगे सरकी
           आने लगे बाग, हरियाले खेत, निराले;
           अपनी भूमि दिखाई दी पहचानी, घर की
           याद उभर आई मन में; तन रहा संभाले।
                  XXX
           क्या-क्या देखूं, सबसे अपना कब का नाता
           लगा हुआ है। रोम पुलकते हैं; प्राणों से
           एकप्राण हो गया हूं, ऐसा क्षण आता
           है तो छूता है तन-मन कोमल बाणों से।”

यह सफर बस से हो, ट्रेन से हो, अपनी गाड़ी से हो, हवाई जहाज से हो या और किसी तरीके से। लौटते वक्त सफर के दौरान पुरानी यादों को ताजा करने के लिए समय जरूर होता है। और मन के भीतर उन यादों का, रिश्तों का हिसाब-किताब शुरू होता है। जिन सुख-सुविधाओं, भौतिकताओं, पैसों, मान-सम्मानों को पाया उससे थोड़ा-बहुत सकुन तो मिलता है परंतु जिन चीजों को खोया उन बाणों से तन-मन लहूलुहान भी होता है। अपने ही आंखों के आयने में झांकने के बाद अपराध भाव भी महसूस होता है। कितने स्वार्थी हो गए हैं हम कि जहां अपनी आत्मा को मरवाकर उड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
चार दिनों की छुट्टी (हॉटेलिंग या पिकनिक!) खत्म होने के बाद मजबूरी होती है कि अपने नौकरी की जगह वापस भी लौटे। दुःख और पीड़ा होती है। पता नहीं फिर वापस कब लौटे। जब लौटे तब आज जो है वह रहेगा या नहीं, भरौसा नहीं! गांव में तो बूढ़े विचरन करने लगे हैं, दो-चार महीने में एक-एक विदाई लेते जा रहा है। अगली बार आए तो कितने उड़ जाए पता नहीं। …मन में भय पैदा होता है कि गांव भी तो बूढ़ा हो चुका है कहीं यह भी उड़ नहीं जाएगा ना? हर समय रिश्तों के कमजोर होने का भय सिर पर मंड़राता है। आवाहन है कि पुराने को मजबूत कर नए को जोड़ना। क्या कभी संभव है कि पुराने पर वापस लौटे और नए को बनाए रखें? …आस-पास घुप्प फैले अंधेरे से कई भूतों की टोलियां उठकर नाचने लगती हैं और कहती हैं कि ‘भाई तुम्हारी यह कल्पना भारत और पाकिस्तान को दुबारा एक करने जैसा है।’ …मैं दहल उठता हूं कि क्या भविष्य में गांव और शहर के रिश्ते भारत-पाकिस्तान जैसे हो जाएंगे?
बेटे का माता-पिता के घर लौटना जरूरी है। माता-पिता का बेटे के घर जाना जरूरी है। बेटी के घर माता-पिता का जाना जरूरी है और बेटी भी माता-पिता के घर वापस लौटकर देखे। हर आदमी लौटकर रिश्ते को मजबूत करें। अर्थात् रिश्ते को बनाए रखना, मजबूत करना आवश्यक है। गांवों और शहरों में दूसरे अर्थों में भारत और इंडिया में इन रिश्तों की मजबूती तो आवश्यक बनती है। चंद्रकांत देवताले ‘बेटी के घर से लौटना’ में अपने आत्मा की पीड़ा को व्यक्त करते हैं –

         “बहुत जरूरी है पहुंचना
          सामान बांधते बमुश्किल कहते पिता
          बेटी जिद करती
          एक दिन और रुक जाओ न पापा
          एक दिन
                      XXX
          सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
          दुनिया में सबसे कठिन है शायद
          बेटी के घर से लौटना।”

व्यापक अर्थों में यह पीड़ा जगह-जगह, स्थान-स्थान महसूस की जाती है। पात्र बदलेंगे पर पीड़ा तो वहीं है। वापस लौटने की अथवा रुकने की मांग तो है ही।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

साहब, दीदी और गुलाम



         'साहब, दीदी और गुलाम' मराठी के प्रसिद्ध लेखक दया पवार की मराठी कहानी है। उसका हिंदी अनुवाद 'रचनाकार'  ई-पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इनका पूरा नाम दगडू मारुती पवार है, साहित्यिक जगत् में दया पवार के नाम से इनकी पहचान बनी हैं। इनका जन्म अहमदनगर जिले के धामणगांव में इ. स. 1935 में हुआ। दलित जाति के भीतर जन्म पाने के कारण बचपन से दलितों के साथ होने वाले अन्याय-अत्याचार से भलिभांति वाकिफ थे। इनके ‘बलुतं’ नामक पहली आत्मकथात्मक साहित्य कृति के कारण मराठी साहित्य एवं दलित साहित्य में नया मोड आ गया। लेखक ने प्रस्तुत कृति में अपने आपको केंद्र में रखा और सारे दलितों के जीवन को वाणी देने का प्रयास किया है। इनकी इस कृति से प्रेरणा पाकर मराठी साहित्य में दलित लेखकों की एक बडी फौज निर्माण हो गई। ‘बलुतं’ आत्मकथन के बाद कहानीसंग्रह - ‘जागल्या’, ‘पासंग’, कवितासंग्रह – ‘कोंडवाडा’ ‘धम्मपद’, अन्य - ‘पाणी कुठंवर आलं गं बाई’, ‘विटाळ’ आदि भी इनकी रचनाएं काफी चर्चित रही है। महानगरीय जीवन के संघर्ष, पैसा और रिश्तों पर प्रकाश डालती कहानी पाठकों को पसंद आएगी। यहां आपके लिए 'रचनाकर' की लिंक दे रहा हूं, आगे पढे - मराठी कहानी – साहब, दीदी और ग़ुलाम

सोमवार, 16 जून 2014

वीरेंद्र जैन का 'शब्द-बध' विचार पुनर्विचार

                प्रिय दोस्तों बहुत दिनों बाद आपसे मिल रहा हूं और कोई रचना आपके पास भेज रहा हूं। आपकी रचनाएं बिच-बिच में देखी भी कुछ पढी भी। पर संदेशों और प्रतिक्रिया के साथ मुलाकात नहीं कर पाया क्षमा चाहता हूं। इन दिनों में गायब होकर डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जी की मराठी किताब 'तिमिरातुनी तेजाकडे' का हिंदी अनुवाद का कार्य पूरा किया है। यह किताब जल्दी ही 'राजकमल' प्रकाशन, दिल्ली से आ जाएगी। इसे पूरा करने में मेरा काफी समय गया और आपके अभाव को महसूस करता रहा। जैसे ही काम पूरा किया कॉलेज को छुट्टियां लगी और इंटरनेटीय दुनिया बंद हो गई या कहे कि गति बहुत कम हो गई। खैर गांव में भी लिखना और पढना जारी रहा। उसीका नतीजा है आपको 'शब्द-बध' उपन्यास की समीक्षा भेज रहा हूं।
              वीरेंद्र जैन ने लेखकीय और प्रकाशन जगत् की वास्तविकताओं इस किताब में सामने रखा है। 'रचनाकार' ई-पत्रिका में प्रस्तुत समीक्षा प्रकाशित हो गई है उसकी लिंक आपके लिए दे रहा हूं  - पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध - डॉ. विजय शिंदे - वीरेंद्र जैन का 'शब्द-बध' विचार-पुनर्विचार
प्रस्तुत आलेख वेब वार्ता से प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक आगे दे रहा हूं - पुस्तक समीक्षा: शब्द-बध - WebVarta | ncr news ...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

'लेखनी' में 'सच कहूं' कविता

     दोस्तों बहुत दिनों से आपसे मुलाखात नहीं और आपके कई महत्त्वपूर्ण लेखों, कविताओं, कहानियों एवं विचारों को मिस कर रहा हूं। पर आपसे आशा है कि आप मुझे दुबारा बात एवं संवाद करने के लिए समय देंगे। फिलहाल आपको इतना कह सकता हूं कि एक अहं काम को अंजाम तक पहुंचानी की कोशिश कर रहा हूं, अतः समय की कमी के चलते आपसे थोडा कटा हूं।
      इसी दौरान 'सच कहूं' नामक एक कविता 'लेखनी' ई-पत्रिका के कविता आज और अब में  में प्रकाशित हो गई है उसकी लिंक FEBURARY-2014-HINDI ( लेखनी: LEKHNI )आपके लिए दे रहा हूं। साथ ही यह कविता ब्लॉग पर भी जोडी है।



सच कहूं
  

सच कहूं तुम्हारी बातों से
‘डर’ लगता है।
तुम उम्र बार-बार
पूछती हो,
गरीब, संवेदनशील, भावुक मन,
बूढा होकर बैठने लगता है।


घबडा कर, अपने आप से
कहीं मैं,
मेरी उमर,
सावला चेहरा,
गंभीर विचार,
मेरा आस-पास
और मेरे संस्कार
तुम्हें पसंद नहीं
ऐसा लगता है।

चाहता हूं आजादी दूं
दुबारा सोचने की।
कहीं ऐसा न हो कि
समय चला जाने के बाद
आफत न आए,
तुम पर पछताने की।

कृपा करो मेरा डर
सच या झूठ में
तब्दील करने की।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

तीन कविताएं

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  •             प्यारे दोस्तों 'रचनाकार' ई-पत्रिका में 'मजबूर हूं', मृत्यु तय हई है' और 'नशा' यह तीन कविताएं प्रकाशित हो गई है। तीनों कविताएं अलग विषय और अलग पृष्ठभूमि को बयां करती है। पखवाडे की कविता के अंतर्गत विजय वर्मा, जतिन दवे, मोतीलाल और अनंत आलोक के बाद क्रम से मेरी तीनों कविताएं है। आप तक उसकी लिंक पहुंचा रहा हूं। लिंक है - पखवाड़े की कविता