बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

किसनगढ़ के शोषण परंपरा की शिनाख्त





                   सृजनकर्ता सृजन क्यों करता है? साहित्य का उद्देश्य क्या है? यश, कीर्ति, मनोरंजन, रुपए कमाना, समाजहित करना या और कोई? अब साहित्य का क्षेत्र सीमित नहीं रहा है, उसमें परिवर्तन हो गए हैं। अनेक विधाएं और विधाओं के अंतर्गत कई प्रकारों में लेखन हो रहा है। उपन्यास विधा में चर्चित बना प्रकार आंचलिक उपन्यास। पाठक, समीक्षक के साथ हर एक को आह्वान करता आंचलिक उपन्यास। इसे बांचना, गुत्थियां सुलझाना, उद्देश्य को पकड़ना, लेखकीय पीड़ा की व्याख्या करना, भाषा के सौंदर्य का विश्लेषण करना, पात्रों के आत्मा की गुंज सुनना... आदि-आदि ‘चैलेंज’ बनकर अंतरबाह्य झकझोर देता है। वर्तमान हिंदी साहित्यकारों में, लेखन करने वाले आंचलिक लेखकों में अग्रणी लेखक के रूप में संजीव को पहचाना जाता है। इनका प्रत्येक उपन्यास आंचलिकता के अनछुए विषयों को लेकर उठता है और उस संसार की विड़ंबनाएं सामने रखता है। यह विड़ंबना उस गांव, आंचल, प्रदेश या किसी विशिष्ट क्षेत्र की होती है परंतु लेखकीय (आंचलिक लेखकों की) विशेषता यह होती है कि वह सीमित होकर व्यापक दर्शन कराती है। कृष्ण ने कुरुक्षेत्र पर खड़े होकर अर्जुन को विराट दर्शन कराए थे। आज प्रत्येक आंचलिक लेखक जीवन की दुर्गम युद्धभूमि पर खड़ा होकर मनुष्य के कई रूपों के दर्शन कराकर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। संजीव भी ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास से ‘देखिए, सोचिए और चेतिए का आह्वान’ करते हैं। आगे पढ़ें: रचनाकार: पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी

शनिवार, 16 अगस्त 2014

अपने घर से लौटते समय

मंथन
अपने घर से लौटते समय

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(प्रस्तुत आलेख लेखनी ई-पत्रिका के मंथनःडॉ. विजय शिंदे | लेखनी/ lekhni अगस्त ...2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है। पूरा आलेख यहां पर दे रहा हूं।)

          वर्तमान सामाजिक ढांचा जिस गति के साथ परिवर्तित हो रहा है उससे अचंभा होता है। यहां ‘परिवर्तित’ शब्द का जानबूझकर इस्तेमाल किया है। दूसरे शब्दों में अगर इसे कहा जाए तो बिखर रहा है, टूट रहा है कहा जा सकता है; जो सामाजिक ढांचे की गिरावट को दिखाता है। आधुनिकता और प्रगति के चलते पुराने ढांचे में जबर्दस्त परिवर्तन हो रहा है। नवीन जरूरतें, नवीन मांगें और आवश्यकताओं के चलते पुराने का बकर्रार रहना बिल्कुल संभव नहीं है। आज हम जिस मकाम पर खड़े हैं वहां से वापस मूड़कर एक नजर डाले, थोड़ा-सा लौटकर हम देखें कि कुछ दिन पहले, कुछ साल पहले, कुछ सदियों पहले हम कहां थें? तो हम चकित हो जाएंगे। कारण हमने इंसान होने के नाते जिन उंचाइयों को छुआ है उससे अचंभित होना लाजमी है। लेकिन यह देखकर भी दुःखी होते हैं कि इंसान होने के नाते पारिवारिक ढांचा, रिश्ते-नातों के नाजुक जुड़ाव को यह आधुनिकता का जामा कमजोर करते गया है। मूल कारण आधुनिकता और इसके साथ अन्य अनेक छोटे-बड़े उपकारणों से मनुष्य जीवन के भीतर अनेक परिवर्तन हो चुके हैं, जिससे व्यक्ति के रिश्तों के धागों में कमजोरी पैदा हो गई है। एक रूखापन-सा आ गया है। भौतिक. भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक… अंतर इतना बढ़ गया है कि इंसान को पता ही नहीं चला कि हम इतने दूर कब और कैसे चले आए। इस पीड़ा से बाहर निकलने के लिए और दुबारा इन रिश्तों को जोड़ने के लिए प्रयास करना जरूरी है। आधुनिकता की अच्छाइयों के स्वीकार के साथ नुकसानदेह बातों को छोड़कर पुराने रिश्तों के धागों को मजबूत करना भी जरूरी है। जंगल के भीतर कोई व्यक्ति अपना रास्ता भटक जाए तो दुबारा रास्ता पाने के लिए उसे उस जगह पर लौटना जरूरी होता है जहां से उसने वापसी के लिए शुरुआत की थी। वापसी के ‘की पॉईंट’ को पाया कि वह संभव है बाहर आने का मार्ग भी पाए। विकास के चलते बढ़ता शहरीकरण और टूटते गांव, बिखरते रिश्ते, किसी जंगल में भटके यात्री से कम नहीं है। गांवों में हाथ-पैर मारने पर भी आम आदमी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने के यथार्थ से जब परिचीत होता है तब मजबूरन गांव को छोड़ देता है और शहर की ओर भागना शुरू कर देता है। उसके मन में भागम्-भाग से एक कचोट निर्माण होती है कि ‘मैं मेरी आत्मा को मारकर निकल रहा हूं।’ क्या कभी उसकी आत्मा जीवित हो सकती है? उसका वापस लौटना संभव है? या युं कहे कि शहर में जो मौके हैं वे गांव के लोगों को गांव में ही मिल सकते हैं। या गांव पूरी तरह युवकों के बिना बूढ़ों के साथ जीने के लिए शापित रहेंगे और बूढ़ों के चल बसने के बाद बिल्कुल विरान हो जाएंगे?
अचानक मन में यह विचार क्यों निर्माण हो गए भाई? …मन के अंदर से एक आवाज उठती है कि – अचानक कैसे? बार-बार तो इन परिस्थितियों से तुम गुजरते हो। कभी ध्यान नहीं दिया, कभी ध्यान दिया तो लताड़कर उसे दूर भगा दिया। शहर जाए तो गांव, घर, घर के लोग, वहां का परिवेश, गाय, भैस, बकरियां, चिड़ियां, वहां की ताजी हवा, हरियाली, पेड़-पौधें, घास, पानी के झरने, गर्मी, कभी सूखा, धूप… क्या-क्या नहीं छोड चले। गांव का इंसान शहर, शहर का बड़े शहर और बड़े शहरों का विदेशों में जा रहा है। नवीन तंत्रज्ञान के चलते यह कड़ियां टूट चुकी हैं, अतः प्रत्येक पढ़ा-लिखा बड़े शहरों और विदेशों में जाने की मंशा रखता है। लेकिन जब भी कभी वह छुट्टियों (दो-चार दिन की हॉटेलिंग या पिकनिक!) के लिए गांव लौटने लगता है तब उसकी पुरानी यादें ताजा होने लगती हैं। त्रिलोचन की कविता ‘घर वापसी’ में इसका मार्मिक वर्णन है –

          “घंटा गुजर गया, तब गाड़ी आगे सरकी
           आने लगे बाग, हरियाले खेत, निराले;
           अपनी भूमि दिखाई दी पहचानी, घर की
           याद उभर आई मन में; तन रहा संभाले।
                  XXX
           क्या-क्या देखूं, सबसे अपना कब का नाता
           लगा हुआ है। रोम पुलकते हैं; प्राणों से
           एकप्राण हो गया हूं, ऐसा क्षण आता
           है तो छूता है तन-मन कोमल बाणों से।”

यह सफर बस से हो, ट्रेन से हो, अपनी गाड़ी से हो, हवाई जहाज से हो या और किसी तरीके से। लौटते वक्त सफर के दौरान पुरानी यादों को ताजा करने के लिए समय जरूर होता है। और मन के भीतर उन यादों का, रिश्तों का हिसाब-किताब शुरू होता है। जिन सुख-सुविधाओं, भौतिकताओं, पैसों, मान-सम्मानों को पाया उससे थोड़ा-बहुत सकुन तो मिलता है परंतु जिन चीजों को खोया उन बाणों से तन-मन लहूलुहान भी होता है। अपने ही आंखों के आयने में झांकने के बाद अपराध भाव भी महसूस होता है। कितने स्वार्थी हो गए हैं हम कि जहां अपनी आत्मा को मरवाकर उड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
चार दिनों की छुट्टी (हॉटेलिंग या पिकनिक!) खत्म होने के बाद मजबूरी होती है कि अपने नौकरी की जगह वापस भी लौटे। दुःख और पीड़ा होती है। पता नहीं फिर वापस कब लौटे। जब लौटे तब आज जो है वह रहेगा या नहीं, भरौसा नहीं! गांव में तो बूढ़े विचरन करने लगे हैं, दो-चार महीने में एक-एक विदाई लेते जा रहा है। अगली बार आए तो कितने उड़ जाए पता नहीं। …मन में भय पैदा होता है कि गांव भी तो बूढ़ा हो चुका है कहीं यह भी उड़ नहीं जाएगा ना? हर समय रिश्तों के कमजोर होने का भय सिर पर मंड़राता है। आवाहन है कि पुराने को मजबूत कर नए को जोड़ना। क्या कभी संभव है कि पुराने पर वापस लौटे और नए को बनाए रखें? …आस-पास घुप्प फैले अंधेरे से कई भूतों की टोलियां उठकर नाचने लगती हैं और कहती हैं कि ‘भाई तुम्हारी यह कल्पना भारत और पाकिस्तान को दुबारा एक करने जैसा है।’ …मैं दहल उठता हूं कि क्या भविष्य में गांव और शहर के रिश्ते भारत-पाकिस्तान जैसे हो जाएंगे?
बेटे का माता-पिता के घर लौटना जरूरी है। माता-पिता का बेटे के घर जाना जरूरी है। बेटी के घर माता-पिता का जाना जरूरी है और बेटी भी माता-पिता के घर वापस लौटकर देखे। हर आदमी लौटकर रिश्ते को मजबूत करें। अर्थात् रिश्ते को बनाए रखना, मजबूत करना आवश्यक है। गांवों और शहरों में दूसरे अर्थों में भारत और इंडिया में इन रिश्तों की मजबूती तो आवश्यक बनती है। चंद्रकांत देवताले ‘बेटी के घर से लौटना’ में अपने आत्मा की पीड़ा को व्यक्त करते हैं –

         “बहुत जरूरी है पहुंचना
          सामान बांधते बमुश्किल कहते पिता
          बेटी जिद करती
          एक दिन और रुक जाओ न पापा
          एक दिन
                      XXX
          सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
          दुनिया में सबसे कठिन है शायद
          बेटी के घर से लौटना।”

व्यापक अर्थों में यह पीड़ा जगह-जगह, स्थान-स्थान महसूस की जाती है। पात्र बदलेंगे पर पीड़ा तो वहीं है। वापस लौटने की अथवा रुकने की मांग तो है ही।

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

साहब, दीदी और गुलाम



         'साहब, दीदी और गुलाम' मराठी के प्रसिद्ध लेखक दया पवार की मराठी कहानी है। उसका हिंदी अनुवाद 'रचनाकार'  ई-पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इनका पूरा नाम दगडू मारुती पवार है, साहित्यिक जगत् में दया पवार के नाम से इनकी पहचान बनी हैं। इनका जन्म अहमदनगर जिले के धामणगांव में इ. स. 1935 में हुआ। दलित जाति के भीतर जन्म पाने के कारण बचपन से दलितों के साथ होने वाले अन्याय-अत्याचार से भलिभांति वाकिफ थे। इनके ‘बलुतं’ नामक पहली आत्मकथात्मक साहित्य कृति के कारण मराठी साहित्य एवं दलित साहित्य में नया मोड आ गया। लेखक ने प्रस्तुत कृति में अपने आपको केंद्र में रखा और सारे दलितों के जीवन को वाणी देने का प्रयास किया है। इनकी इस कृति से प्रेरणा पाकर मराठी साहित्य में दलित लेखकों की एक बडी फौज निर्माण हो गई। ‘बलुतं’ आत्मकथन के बाद कहानीसंग्रह - ‘जागल्या’, ‘पासंग’, कवितासंग्रह – ‘कोंडवाडा’ ‘धम्मपद’, अन्य - ‘पाणी कुठंवर आलं गं बाई’, ‘विटाळ’ आदि भी इनकी रचनाएं काफी चर्चित रही है। महानगरीय जीवन के संघर्ष, पैसा और रिश्तों पर प्रकाश डालती कहानी पाठकों को पसंद आएगी। यहां आपके लिए 'रचनाकर' की लिंक दे रहा हूं, आगे पढे - मराठी कहानी – साहब, दीदी और ग़ुलाम

सोमवार, 16 जून 2014

वीरेंद्र जैन का 'शब्द-बध' विचार पुनर्विचार

                प्रिय दोस्तों बहुत दिनों बाद आपसे मिल रहा हूं और कोई रचना आपके पास भेज रहा हूं। आपकी रचनाएं बिच-बिच में देखी भी कुछ पढी भी। पर संदेशों और प्रतिक्रिया के साथ मुलाकात नहीं कर पाया क्षमा चाहता हूं। इन दिनों में गायब होकर डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जी की मराठी किताब 'तिमिरातुनी तेजाकडे' का हिंदी अनुवाद का कार्य पूरा किया है। यह किताब जल्दी ही 'राजकमल' प्रकाशन, दिल्ली से आ जाएगी। इसे पूरा करने में मेरा काफी समय गया और आपके अभाव को महसूस करता रहा। जैसे ही काम पूरा किया कॉलेज को छुट्टियां लगी और इंटरनेटीय दुनिया बंद हो गई या कहे कि गति बहुत कम हो गई। खैर गांव में भी लिखना और पढना जारी रहा। उसीका नतीजा है आपको 'शब्द-बध' उपन्यास की समीक्षा भेज रहा हूं।
              वीरेंद्र जैन ने लेखकीय और प्रकाशन जगत् की वास्तविकताओं इस किताब में सामने रखा है। 'रचनाकार' ई-पत्रिका में प्रस्तुत समीक्षा प्रकाशित हो गई है उसकी लिंक आपके लिए दे रहा हूं  - पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध - डॉ. विजय शिंदे - वीरेंद्र जैन का 'शब्द-बध' विचार-पुनर्विचार
प्रस्तुत आलेख वेब वार्ता से प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक आगे दे रहा हूं - पुस्तक समीक्षा: शब्द-बध - WebVarta | ncr news ...

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

'लेखनी' में 'सच कहूं' कविता

     दोस्तों बहुत दिनों से आपसे मुलाखात नहीं और आपके कई महत्त्वपूर्ण लेखों, कविताओं, कहानियों एवं विचारों को मिस कर रहा हूं। पर आपसे आशा है कि आप मुझे दुबारा बात एवं संवाद करने के लिए समय देंगे। फिलहाल आपको इतना कह सकता हूं कि एक अहं काम को अंजाम तक पहुंचानी की कोशिश कर रहा हूं, अतः समय की कमी के चलते आपसे थोडा कटा हूं।
      इसी दौरान 'सच कहूं' नामक एक कविता 'लेखनी' ई-पत्रिका के कविता आज और अब में  में प्रकाशित हो गई है उसकी लिंक FEBURARY-2014-HINDI ( लेखनी: LEKHNI )आपके लिए दे रहा हूं। साथ ही यह कविता ब्लॉग पर भी जोडी है।



सच कहूं
  

सच कहूं तुम्हारी बातों से
‘डर’ लगता है।
तुम उम्र बार-बार
पूछती हो,
गरीब, संवेदनशील, भावुक मन,
बूढा होकर बैठने लगता है।


घबडा कर, अपने आप से
कहीं मैं,
मेरी उमर,
सावला चेहरा,
गंभीर विचार,
मेरा आस-पास
और मेरे संस्कार
तुम्हें पसंद नहीं
ऐसा लगता है।

चाहता हूं आजादी दूं
दुबारा सोचने की।
कहीं ऐसा न हो कि
समय चला जाने के बाद
आफत न आए,
तुम पर पछताने की।

कृपा करो मेरा डर
सच या झूठ में
तब्दील करने की।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

तीन कविताएं

  •    
  •             प्यारे दोस्तों 'रचनाकार' ई-पत्रिका में 'मजबूर हूं', मृत्यु तय हई है' और 'नशा' यह तीन कविताएं प्रकाशित हो गई है। तीनों कविताएं अलग विषय और अलग पृष्ठभूमि को बयां करती है। पखवाडे की कविता के अंतर्गत विजय वर्मा, जतिन दवे, मोतीलाल और अनंत आलोक के बाद क्रम से मेरी तीनों कविताएं है। आप तक उसकी लिंक पहुंचा रहा हूं। लिंक है - पखवाड़े की कविता

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

मेरी किताबें


सवासीन

 1.. 'सवासीन' छोटी साईज मुखपृष्ठ.jpg दिखा रहा है 
 सवासीन (कहानी संग्रह) – लेखक डॉ. विजय शिंदे,
 प्रियदर्शी प्रकाशन, कोल्हापुर, प्रथम – 2004, मूल्य – 48,
 पृष्ठ – 94, ISBN: 81-87056-45-II

‘सवासीन’(भारतीय साहित्य संग्रह की लिंक - सवासीन) डॉ. विजय शिंदे द्वारा मराठी भाषा में लिखित पहला कहानी संग्रह है, जिसमें दस कहानियों का समावेश हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह को ‘महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृति मंडल’ का प्रकाशनार्थ अनुदान भी प्राप्त हुआ है।
      गांव, गांव के भीतर के विविध पात्र और घटनाओं को केंद्र में रख कर बडे रोचक और मार्मिक ढंग से इस कहानी संग्रह की कहानियां सजी है। ग्रामीण भाषा की सुंदर गंध विविध पात्रों के माध्यम से कहानियों में उतरती है। ‘सवासीन’ कहानी में एक सुहागन का ‘नाग’ जैसे विषैले सांप के काटने से मरना आम ग्रामीण वास्तविकता को प्रकट करता है। आज भी गांवों के भीतर सांपों के काटने से कई लोग मरते हैं। अस्पताल की अपेक्षा मदिरों और झाड़-फूंक पर विश्वास करने वाले लोग बेवजह अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। मन-मस्तिष्क और दिल में एक मर्मांतक पीडा निर्माण करने वाली ‘सवासीन’ कहानी शीर्ष होने को सही ठहराती है। ‘तयब्याचं हाटेल’, ‘सुतारपाटील’, और ‘प्वार’ जैसी कहानियों में विशिष्ट पात्र को केंद्र में रख कर बुना गया है। पात्रों की सूक्ष्मताएं, उनकी सही-गलत आदतों का चित्रण उनमें वर्णित है। ‘फाकड्या’, ‘आकणीचं पाय’ जैसी कहानियों में आदतों से मजबूर व्यक्ति नैतिकता को छोड़ कर गलत कदम उठाता नजर आता है। शराब की लत से पीडित व्यक्ति खुद तो बरबाद होता ही है पर अपने परिवार को भी ले डूबता है, इसका सार्थक रेखांकन ‘फाकड्या’ में है। ‘आकणीचं पाय’ कहानी में पतित हो चुकी आकणी अपने मां-बाप, परिवार और पति की इज्जत दांव पर लगा कर केवल शरीर सुख पाने के लिए झूठ का सहारा लेकर बचने की कोशिश करते नजर आती है। ड्रायव्हरों की जिंदगी संघर्षपूर्ण है और हमेशा उसके लिए खतरा बना रहता है। देश में विभिन्न जनजातियां अपराधिक कृत करती है केवल पेठ की भूख मिटाने के लिए और परिवार का पालन-पोषण करने के लिए। ‘धडपड’ कहानी में ऐसे ही अपराधिक जनजाति के हाथों अपनी जान गवां बैठे ड्रायव्हर का वर्णन है। ड्रायव्हर और अपराध को अंजाम देते खून की होली खेलते लुटेरों का वर्णन ‘धडपड’ में है। अपराधिक जनजातियां चोरी-डकैती करती है और इसे अंजाम देते वक्त इंसान को जान से मारने का पाप केवल जीने के लिए की कोशिश का नतिजा होता है। अर्थात् जीने का जबरदस्त संघर्ष दोनों तरफ से ‘धडपड’ में है।  मोबाईल और फोन से गांवों की दुनिया बदल चुकी है और इस आधुनिक उपकरण से मानवीयता खत्म होने का संकेत ‘क्रिंग-क्रिंग’ कहानी में है। खाना प्राप्ति का एक जरिया शिकार है। ‘माग’ कहानी में कुत्तों की मदत से खरगोश का शिकार करना, उसकी रोचकता और चित्र सौंदर्य बारिकी से उकेरा गया है। ‘जेव्हा पाईप फुटतो’ में दुर्घटनावश हो गई गलती से पीडित बच्चे की मानसिकता का वर्णन है।
      महाराष्ट्र और महाराष्ट्रीयन गांवों के विविध घटनाओं में से कुछ घटनाओं को पाठकों तक पहुंचाने का लेखक का प्रयास रहा है। भाषाई सौंदर्य, घटनाओं को पिरोने की अद्भुत कला, कहानियों को चरम तक पहुंचाने की क्षमता लेखकीय कुशलता मानी जाएगी।

 ययाति

 2.. 'ययाति' छोटी साईज मुखपृष्ठ.jpg दिखा रहा है
 ययाति (अनुवादित कहानी संग्रह)
 अनुवादक डॉ. विजय शिंदे, डॉ. अशोक बाचुळकर,
 प्रियदर्शी प्रकाशन, कोल्हापुर, प्रथम – 2004, मूल्य – 75,
 पृष्ठ – 103, ISBN: 81-87056-49-5

  ‘ययाति’(भारतीय साहित्य संग्रह की लिंक ययाति) डॉ. विजय शिंदे और डॉ. अशोक बाचुळकर द्वारा श्रेष्ठ भारतीय भाषाओं से मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह है। हिंदी, उडिया, डोगरी, तेलुगू, कोंकणी, मैथिली, राजस्थानी, असमी, नेपाळी और तमिळ भाषा के चुनिंदा कहानियों को मराठी भाषा में लेकर आने का महत् प्रयास अनुवादकों ने किया है। ‘पिताजी’ – ज्ञानरंजन, ‘कंधा’ – सुरेश कांत, ‘खोल दो’ – सआदत हसन मंटो, ‘यहीं सच है’ – मन्नू भंडारी, ‘ययाति’ – बिपिन बिहारी मिश्र, ‘व्यापारी’ – ललित मंगोत्रा, ‘गुरु साक्षात्’ – अवधानुल विजयलक्ष्मी, ‘दरारों वाला आयना’ – मनोहरराय सरदेसाय, ‘अपराधी’ – कर्ण थामी और ‘जिल्लू’ – सुजाता आदि लेखकों की कहानियों को इस किताब में समाविष्ट किया है।

      भारत के विभिन्न भाषाओं में अमूल्य धन छिपा हुआ है, वह अनुवाद के माध्यम से वितरीत हो रहा है और साहित्य पठन की रुचि रखने वाले पाठकों के पास पहुंच रहा है। दूसरी भाषा का ज्ञान न होने के कारण साहित्यिक निधि से हम अपरिचीत और अछूते रहते हैं पर अनुवाद एक ऐसा जरिया है जिससे सांस्कृतिक और साहित्यिक आदान-प्रदान होता है। अन्य भाषा का श्रेष्ठ साहित्य अलग-अलग भाषाओं में पहुंचाने का पुण्य कार्य अनुवाद करता है। ‘ययाति’ के माध्यम से दोनों अनुवादकों का प्रयास अन्य भाषा की चर्चित, चुनिंदा, और संस्कारक्षम कहानियों का अनुवाद कर पाठकों तक पहुंचाने का रहा है।

 एकांत तपस्वी

 3.. 'एकांत तपस्वी' छोटी साईज मुखपृष्ठ.jpg दिखा रहा है

 एकांत तपस्वी (कहानी संग्रह) - डॉ. विजय शिंदे,
 शब्दालोक प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम – 2007,
 मूल्य – 125,पृष्ठ – 88, ISBN: 181-903577-5-1 
     ‘एकांत तपस्वी’(भारतीय साहित्य संग्रह की लिंक - एकांत तपस्वी) डॉ. विजय शिंदे का हिंदी भाषा में प्रकाशित पहला कहानी संग्रह है, जिसमें सोलह कहानियों का समावेश हैं। समय-दर-समय विभिन्न अनुभवों को बटोरती लेखकीय लेखनी छोटे-छोटे प्रसंगों में बहुत कुछ देखती है और कागजों पर उन अनुभवों को उतारती है। इस किताब में समाविष्ट कई कहानियों के भीतर आने वाले युवा पात्र के सर पर चढ़कर ज्यादा मात्रा में भविष्य की चिंता ही बोलने लगती है; जो न केवल लेखक की है, वर्तमान युग में जीने वाले युवकों की वास्तविक चिंता है।

      वर्तमान युग में सामाजिक स्थिति इतनी भयानक हो चुकी है कि जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। जब तक पढाई कर रहे हैं तब तक
इस परिस्थिति के ताप से युवक कोसों दूर रहते हैं। जैसे ही पढाई का दौर खत्म होता है, तब असली दौड़ शुरू होती है युवकों की। ठोकरे खाने के बाद दुःखी-पीडित मन निराशा की खाई में खो जाता है, जहां केवल अंधेरा ही अंधेरा होता है। उस घने-काले-भयानक अंधेरे में आप आंखें फाडे कहीं कुछ उजियाला है या नहीं, खोजने का असल प्रयास करते हैं। खोज-बीन में और...और अंधकार के जंगल में भटक जाते हैं। यह स्थिति हर युवा मन की है, जिनमें से कुछ को नौकरी-सुख-शांति-सुविधा-सुकून के रत्न मिलते हैं। परंतु उस ‘कुछ’ में सारी युवा पीढी नहीं। तब सवाल यह उठता है कि उस बची हुई सारी युवा पीढी का क्या होगा; जो छटपटा रही है, तड़प रही है, आधारविहीन होकर लटक रही है ? बस सवाल बनते हैं उत्तर कुछ भी नहीं। युवकों की यह स्थिति अश्वत्थामा जैसी है, जो माथे पर का रिसता-टिसता घांव लेकर देश-दुनिया में भटक रहे हैं। लेखक भी उसी पीढी का हिस्सा है, इसी दौर से गुजर चुका है, गुजर रहा है और गुजरते जा रहा है। संघर्षों के बीच से मिले कुछ अनुभव कहानी का स्वरूप धारण कर आकार ग्रहण करते गए हैं। आस-पास घटित घटनाओं का गंभीर विश्लेषण करते हैं। वैसे युवाओं को मौज-मस्ती-मजाक करना चाहिए, परंतु परिस्थिति इनके अधिकार को छीन रही है। बस ऐसा ही लेखक के साथ हुआ और उससे गंभीर बाते बाहर निकलती गई। असमय ही लेखक का युवा मन प्रौढ़ बनता गया। अनुभवों के बलबूते पर परिपक्व होती यहीं सोच कहानियों का स्वरूप धारण कर कागजों पर उतरती गई है।

      हिंदी भाषा के प्रति विशेष प्रेम रखने वाला लेखक ‘एकांत तपस्वी’ के माध्याम से भारत के दूर-दराज में वास करने वाले पर हिंदी की निस्सीम सेवा करने वाले व्यक्ति को सही मायने में किताब के भीतर समाविष्ट कर सही न्याय देता है। ‘समस्याओं की जड़’ ‘विदा ले ली’, ‘जप हरे कृष्णा हरे राम’ और ‘भिखारी’ जैसी कहानियों में यात्रा वर्णन का पूट कहानी के कलापक्ष में और अधिक निखार लेकर आता है। ‘एक और पिताजी’ में कन्या भ्रूण हत्या करने वाले पिता की निर्लज्जता का बेबाकी से वर्णन है, और डॉक्टरों का यह कृत्य किसी कसाई से कम नहीं बताता है। ‘उपहासात्मक हंसी’, ‘कभी-कभी...’, ‘स्वाभीमान...’, ‘लिफाफा’ जैसी कहानियां शिक्षा जगत् के विविध पहलू पर प्रकाश डालती है। ‘कौन सिलेगा’, ‘आबासाहब की मुछें’, ‘प्यारे तकिए को’, जैसी कहानियों में व्यंग्य की पैनी धार भी देखी जाती सकती है।

 इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्यः स्थिति एवं संभावनाएं

 4.. 'इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्यः स्थिति एवं संभावनाएं' छोटी साईज मुखपृष्ठ.jpg दिखा रहा है

 इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्यः स्थिति एवं संभावनाएं 
 सं. डॉ. विजय शिंदे, डॉ. रंजना चावडा, डॉ.सुलक्षणा जाधव, 
 राज पब्लीशिंग हाऊस, जयपुर, प्रथम –2012, 
 मूल्य – 995, पृष्ठ – 248, ISBN: 978-93-81005-31-6 
     
      देखते-देखते इक्कीसवीं सदी का एक दशक गुजर गया। परिस्थितियां बदल रही हैं; विश्व स्तर पर 2020 या उसके बाद के भारत की स्थितियों की तरफ देखने का नजरिया भी बदल रहा है। उभरती हुई एक बडी ताकद के नाते अमरिका जैसे विकसित देश भारत की तरफ स्पर्धा की दृष्टि से देख रहे हैं। परंतु हमारे मन में साशंकता है... क्यों? क्योंकि घर की मुर्गी दाल बराबर समझने की हमारी आदत है। लेकिन थोडा सोचे, दिमाग पर जोर दें तो दांवे के साथ कह सकते हैं 2020 तक ना सही थोडा आगे जाकर भारत विश्व की बडी ताकद बनेगा इसमें कोई शक नहीं।

      बडी ताकद, विश्व के साथ स्पर्धा, गिने-चुने लोगों में भारत का स्थान कानों को सुनने के लिए और पढ़ने के लिए अच्छा लगता है। चारों तरफ से भारत का परिवर्तन हो रहा है, खुशी है। यह परिवर्तन जैसे उद्योग और आर्थिक दृष्टि से हो रहा है वैसे ही सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थितियों में होगा और इसका असर साहित्यिक दृष्टियों से भी पडेगा। भारतीय व्यक्ति जैसे-जैसे बदल रहा है वैसे-वैसे उसकी भाषा भी बदल रही है। वह समय दूर नहीं जहां भारत की सारी भाषाएं एक-दूसरे के साथ घुल-मिलकर एक नया रूप धारण करेंगी। विविध कार्यों से एक आदमी कई गांवों, शहरों और देशों में पहुंच रहा है। देश एवं भाषाओं की सीमाओं को लांघ रहा है। ऐसी स्थिति में साहित्य भी बदले आश्चर्य नहीं लगेगा। वर्तमान का वर्णन और भविष्य का संकेत साहित्य है। कुछ साल पहले साहित्य में पीडित शोषित वर्ग का चित्रण नाममात्र रहा लेकिन आज उसकी बाढ़ आ चुकी है। दबे-कुचले लोगों ने अपनी वाणी को धारदार बनाकर साहित्य जगत् को खंगाल डाला पर इसके संकेत तो 1920-1930 से मिल रहे थे। मनुष्य की कल्पनाएं साहित्य में उतरती है और साहित्य का आधार लेकर विज्ञान विकसित होता है। ‘पुष्पक यान’ का जिक्र रामायण में आया; आधुनिक युग में हवाई जहाज बने। भारत का आरंभिक साहित्य रामायण-महाभारतीय युद्धों से प्रभावित है और रामायण-महाभारत में युद्ध से संबंधित कई ताकतों का जिक्र है, जिनको काल्पनिक मानकर मजाक उडाया जा सकता है परंतु आज अणुशक्तियों से जोड़कर उसे देखे तो कल्पना काफुर हो जाती है। ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्यः स्थिति एवं संभावनाएं’ किताब के भीतर इन्हीं सूक्ष्मताओं के साथ विमर्श हुआ है। भूतकालीन एवं वर्तमानकालीन साहित्य को देखकर भविष्य का हिंदी साहित्य कौनसी करवट ले सकता है इसको पकड़ने की कोशिश इस किताब में की है। बाजारीकरण, औद्योगिकीकरण से मनुष्य एक-दूसरे के बहुत नजदीक पहुंच चुका है। एक-दूसरे के विचारों से सभी प्रभावित हो रहे हैं और यह प्रभावित होना इंसान का चहुंमुखी है। केंद्र में है अर्थ – पैसा। पैसा अपनी अंगुलियों पर आदमी को नचाने की कोशिश कर रहा है। झुग्गी-झोपडियां टूटी, पक्के घर बने; गांव टूटकर बिखर रहे हैं और नगर-शहर-महानगर बनते जा रहे हैं। रोज नवीन विकास यात्राएं और उसके साथ नव-नवीन मुश्किलें। ऐसी स्थिति में इंसानों की तकलीफें साहित्य में उतरना लाजमी है। हिंदी साहित्य का आदिकाल राजाओं और राजदरबारी कवियों का, मध्ययुग भक्ति और श्रृंगार कवियों का, आधुनिक युग नवजागरण और परिवर्तन का और भविष्य? किताब के भीतर इसी सवाल को केंद्र में रखा है।

      किताब के बहाने कई सवाल उठ सकते हैं और साहित्यकार, समीक्षक और पाठक भी इस पर बारिकी से सोच सकते हैं। विविध विधाओं और विषयों पर केंद्रित 41 आलेख किताब में समाविष्ठ किए है। प्रत्येक आलेख की केंद्रिय सोच हिंदी का भविष्य कालिन साहित्य ही रही है। डॉ. विजय शिंदे, डॉ. रंजना चावडा, डॉ. सुलक्षणा जाधव, डॉ. अनिता शिंदे, बाबू गिरी, डॉ. अशोक बाचुळकर, ज्योति दाभाडे, डॉ. शोभा ढाकणीकर, प्रेमनाथ घोडके, बालाजी जोकरे, परमेश्वर काकडे, डॉ. रमेश शिंदे, डॉ. गिरीश काशिद, रेवती कावळे, डॉ. दत्ता कोल्हारे, डॉ. धनाजी कुट्टे, डॉ. सरोज पगारे, डॉ. रेणुका मोरे, सुचिता हंगरगे, डॉ. शरफोद्दिन शेख, डॉ. सोनाली पंडित, डॉ. सुनिल बनसोडे, डॉ. संतोष तांदळे, विनोदकुमार वायचळ, जयंत बोबडे, दिग्विजय टेंगसे, श्रीकांत गोस्वामी, डॉ. मदिना शेख, डॉ. जायदा शेख, डॉ. मुकुंद कवडे, दामोदर मोरे, डॉ. मीरा निचळे, जी.एस. पाडंव, प्रकाश शिंदे, बबन सदामते, मुखत्यार शेख, शंकर शिवशेट्टे, डॉ. विनोद जाधव, डॉ. विशाला शर्मा, छाया जाधव, डॉ. सुरेश गरूड, डॉ. सुनिल जाधव, शेखर खडसे आदि समीक्षकों ने हिंदी साहित्य के भूत और वर्तमान को देख भविष्यालीन हिंदी साहित्य के संभावनाओं पर प्रकाश डाला है।
    प्रस्तुत किताबों का सक्षिप्त परिचय भारतीय साहित्य संग्रह के 'पुस्तक ऑर्ग' पर भी है। उसकी लिंक है -
(डॉ. विजय शिंदे की किताबें - भारतीय साहित्य संग्रह)