सोमवार, 2 मार्च 2015

अंधविश्वास उन्मूलनः सिद्धांत - खंड - 3


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अंधविश्वास उन्मूलनः सिद्धांत - खंड -3
मूल लेखकडॉ. नरेंद्र दाभोळकर, अनुवादडॉ. विजय शिंदे

अंधविश्वास उन्मूलनः सिद्धांतखंड 3 (अनुवाद कथेतर गद्य)
लेखक डॉ. नरेंद्र दाभोळकर, अनुवादक - विजय शिंदे, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रथम – 2015, मूल्य – 150 रु., पृष्ठ – 170, ISBN: 978-81-267-2794-0

डॉ. नरेंद्र दाभोळकर किसी परिचय के मोहताज नहीं है। अंधविश्वास उन्मूलन के लिए अपना जीवन दांव पर लगाना और उसके लिए अंत तक लडाई करना कोई छोटी बात नहीं है। वे केवल खुद लडे नहीं तो महाराष्ट्र में एक ऐसा बडा संगठन खडा किया जो केवल महाराष्ट्र के लिए नहीं तो पूरे भारत में खडा होने की जरूरत है। हमारे देश समाज में ऐसे कई झुठ और पाखंड खडे किए हैं कि जिससे आम आदमी का शोषण हो रहा है, उसे लूटा जा रहा है। किसी को लगता नहीं कि हमारे देश की प्रगति में ये सारे पाखंड बाधक है? डॉ. नरेंद्र दाभोळकर जी को लगा और अपने निजी जीवन के सुख और भोगों को त्याग कर एक आदमी विवेक और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ समाज में वह दृष्टि लाने के लिए प्रयास करता रहा। कई दोस्त, साथी-संगी, लोग जुडते गए और एक बडा कारवां बना। अंधविश्वास उन्मूलन का कानून महाराष्ट्र में उनके बलिदान के पश्चात् बना। जिसके लिए जिंदगी भर लडते रहे वह मृत्यु के बाद बनाने की अनुमति दी महाराष्ट्र सरकार ने। सभी राजनीतिक लोग और दल उनके कानून को स्वीकारते-मानते तो थे, इसकी जरूरत महसूस करते थे परंतु अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए चुप थे। परंतु वे भूल चुके थे कि इससे सामाजिक हित दांव पर लग रहा है। शायद डॉ. दाभोळकर जी के मृत्यु के पश्चात् महाराष्ट्र सरकार को शर्म महसूस हो गई और हरकत में आकर विधान सभा और विधान परिषद के दोनों सदनों में इस को अनुमति देकर कानूनी स्वीकृति दी। अंधविश्वास उन्मूलन कानून को कानूनी स्वीकृति। हमारे देश में बहुत बडी विडंबना यह है कि किसी भी अच्छे कार्य के लिए कानूनी ठप्पे की आवश्यकता होती है और गैरकानूनी कार्य बिना किसी ठप्पे के कानूनी इजाजत और सरकारी मान्यता के तहत चलते है!
डॉ. नरेंद्र दाभोळकर जी ने लगभग एक दर्जन किताबें इसी विषय से जुडकर लिखी, साधना पत्रिका को चलाया, अंधश्रद्धा निर्मूलन वार्तापत्रको चलाया। जहां संभव हो वहां लिखते रहें, बोलते रहें, भाषण करते रहें; केवल सामाजिक हित के लिए। परिवार का सोचा नहीं, बच्चों का सोचा नहीं, अपने बारे में भी सोचा नहीं। ऐसे कई लोग उनके साथ जुडते गए जो अपने बारे में सोचना छोडकर समाज का भला चाहते हैं। केवल एक ही उद्देश्य समाज की बंद आंखें खुल जाए। मूल मराठी किताब जिसमें डॉ. दाभोळकर जी के संपूर्ण तत्त्व, विचार और सिद्धांतों का सार है, वह हैतिमिरातुनी तेजाकडे अंधेरे से प्रकाश की ओर; जिसमें विचार, आचार और सिद्धांत तीन खंड है। हिंदी जगत् की प्रमुख प्रकाशन संस्था राजकमल ने इसे हिंदी में लाकर बहुत बडा सामाजिक कार्य किया है। मूल किताब को हिंदी के भीतर तीन खंडों में अलग-अलग रूप से प्रकाशित किया है। अंधविश्वास उन्मूलनः विचार (खंड - 1), अंधविश्वास उन्मूलनः आचार (खंड - 2), अंधविश्वास उन्मूलनः सिद्धांत (खंड - 3) यह तीन किताबें 27 फरवरी, 2015 को भारत के उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी के शुभ हाथों से उपराष्ट्रपति भवन में के कॉन्फरंस हॉल में विमोचित की गई। इस प्रकाशन के लिए हिंदी के प्रसिद्ध समीक्षक नामवर सिंह, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त मराठी के लेखक भालचंद्र नेमाडे, राजकमल के प्रमुख अशोक माहेश्वरी, अलिंद माहेश्वरी, सांसद हुसेन दलवाई, गांधी स्मारक की संचालिका मणिमाला जी, तीनों किताबों के संपादक डॉ. सुनिल कुमार लवटे, अनुवादक डॉ. विजय शिंदे, डॉ. चंदा गिरीश, डॉ. प्रकाश कांबळे, अंधश्रद्धा निर्मूलन के प्रमुख अविनाश पाटिल, सुधिर निबांळकर और डॉ. नरेंद्र दाभोळकर जी की बेटी मुक्ता दाभोळकर के साथ तमाम मीडिया कर्मी और विज्ञानवादी विवेकवादी प्रतिष्ठित उपस्थित थें।
डॉ. नरेंद्र दाभोळकर महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निमूर्लन समिति के कार्य के जरिए न सिर्फ महारष्ट्र में अपितु समूचे भारत वर्ष में प्रगतिमूलक आचार, विचार और सिद्धांत के जरिए चितंक और कृतिशील सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में परिचित है। सन् 1989 में समिति की स्थापना की और उसके आधार पर महाराष्ट्र के कोने-कोने में अंधविश्वास के खिलाफ अलख जगाया। वैसे महाराष्ट्र में समाजसुधारकों की और सुधारवादी विचार, उपक्रम और गतिविधियों की लंबी परंपरा है। उसके चलते महाराष्ट्र में प्रगतिशील माहौल महात्मा ज्योतिबा फुले, सुधारककार गोपाल गणेश आगरकर, लोकहितवादी गोपाल हरि देशमुख, महर्षि विठ्ठल रामजी शिंदे, महर्षि धोंडों केशव कर्वे, राजर्षि शाहू महाराज, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, संत गाडगेबाबा, स्वातंत्रवीर सावरकर, प्रबोधनकार ठाकरे आदि ने अंधविश्वास उन्मूलन में बडा योगदान दिया है। धर्म, ईश्वर जातिभेद, स्त्री-पुरुष समानता, स्त्री शिक्षा, विषमता, शोषण, रूढि-परंपरा आदि के संदर्भ में इन सुधारकों ने बडी भूमिका निभाई है। इसके चलते जाति-धर्म निरपेक्षता, स्वातंत्र, समता, बंधुता, लोकतंत्र, विज्ञाननिष्ठा, विवेकवाद जैसे जीवनमूल्य यहां अपनी जडे जमा पाए हैं। यहीं कारण है कि भारत वर्ष में महाराष्ट्र की पहचान अग्रणी, कृतिशील राज्य के रूप में हैं।
स्वातंत्र्योत्तर काल में इस परंपरा का निर्वाह करते हुए डॉ. नरेंद्र दाभोळकर की दूरदृष्टि, संगठन कौशल, कार्य की निरंतरता, उपक्रमशीलता, संयोजन कुशलता के कारण महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने विवेकवादी विज्ञाननिष्ठ समाज रचना का सपना देखा। सभी जाति, धर्म, तबके के कार्यकर्ताओं का निर्माण, वैचारिक रूप से समान संगठनों की एकता, पत्रकारिता, प्रकाशन, माध्यम, प्रबोधन, लोकजागरण - क्या नहीं किया डॉ. नरेंद्र दाभोळकर जी ने। यहीं कारण है कि वे धर्मांध, जातिवादी, पाखंडी तत्त्वों के लक्ष बने और अज्ञात बंधूकधारियों ने उनकी 20 अगस्त, 2013 में निर्मम हत्या कर दी। हत्यारों का लक्ष्य डॉ. दाभोळकर के संगठन और विचार को कुचलना था। हुआ उलटा। उनकी हत्या की प्रतिक्रिया समूचे भारत में उठती रही। दाभोळकर जी की मृत्यु के कुछ दिनों पूर्व महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने सन् 1995 से की जा रही जादू-टोना प्रतिबंध अधिनियम पारित करने की मांग के प्रति सरकार की निष्क्रियता, उपेक्षा और उदासीनता को उजागर करते हुए कृष्णपत्रिका का प्रकाशन किया था। हत्या से उभरे लोकक्षोभ के आगे घुटने टेककर महाराष्ट्र सरकार अंततः महाराष्ट्र नरबलि और अन्य अमानुष, अनिष्ट एवं अघोरी प्रथा तथा जादू-टोना प्रतिबंधक एवं उन्मूलन अधिनियम – 2013 अध्यादेश को अमल में ले आई। पर उसके लिए डॉ. नरेंद्र दाभोळकर को शहीद होना पडा। इसमें अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति को बडा नुकासान हुआ, वह शायद भर सकता है? परंतु महाराष्ट्र और देश का जो नुकसान हुआ है वह कभी नहीं भरा जा सकता है।
अंधविश्वास उन्मूलन को लेकर प्रकाशित विचार, आचार और सिद्धांत के तीनों खंडों के माध्यम से संपूर्ण भारत में दाभोळकर जी के विचारों को लेकर जाने का समिति का प्रामाणिक प्रयत्न है। अंधविश्वास उन्मूलनः सिद्धांत (खंड - 3) के भीतर निम्न विषयों पर सैद्धांतिक पक्ष रखा गया है -
·         परमेश्वर

·         धर्म

·         विश्वास-अंधविश्वास

·         मेरा आध्यात्मिक आकलन

·         स्त्रियां और अंधविश्वास निर्मूलन

·         महाराष्ट्र के समाजसुधारक और अंधविश्वास निर्मूलन

·         धर्मनिरपेक्षता

·         विवेकवाद

·         परिशिष्ट
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जाने वाली यह तीनों पुस्तकें परंपरा का तिमिर भेद तो है ही, विज्ञान लक्ष्य भी है।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

साहित्यिक अनुसंधान और कलापक्ष

 

         साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी है। इस दुनिया में साहित्यकार और समीक्षकों की कतार भी बहुत लंबी है। विभिन्न भाषाओं को लेकर आंकना शुरू करें तो किसी भी लिखने वाले के अस्तित्व की बात बहुत ही छोटी लगती है, चाहे वह लेखक हो या समीक्षक। हिंदी भाषा का विचार करें तो विश्व स्तर पर उसका दृश्य स्वरूप धुंधलाते आकाश-सा लगता है और उसके भीतर लेखक-समीक्षकों के नाम टिम-टिमाते तारे-से नजर आते हैं। फिर भी केवल और केवल हिंदी साहित्य और भाषा के छोटे-बड़े, है-नहीं है ऐसों को अगर गिनना शुरू करें तो उसकी दुनिया छोटी नहीं है, बहुत बड़ी है। इस हिंदी दुनिया का भला करने के लिए हर एक व्यक्ति ने सैनिक बन योगदान दिया है। लेखक और समीक्षक उनमें से एक सैनिक है। उन्हें हम चाहे तो सैनिक कह सकते हैं, सरदार कह सकते हैं, सेनापति कह सकते हैं.... या और बहुत कुछ। लेकिन पत्थर की सफेद लकीर के समान यह सच है कि हिंदी साहित्य को बनाने का काम इन दोनों ने किया है। इनमें हम कौन हैं? मैं कौन हूं? हमारी भूमिकाएं क्या है? हमारा दायित्व क्या है? इसके पहले हमने कुछ सही किया? आज जिन रास्तों पर चल रहे हैं, जिन रास्तों पर चलना चाहते हैं उसके अनुकूल, भले के लिए कुछ कदम उठाएं? या हमारे मन में कुछ अलग मंशाएं हैं?... या हम शेर की खाल ओढ़े सियार बन केवल डिंगे हांकने में लगे हैं?
        हमें नहीं लगता कि विश्विद्यालयों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की कृपा से चल रहे देश में जितने भी साहित्यिक अनुसंधान के केंद्र हैं वहां पर कलापक्षीय अनुसंधान की वाट लगी है? कलापक्षीय आयामों पर न के बराबर अनुसंधान हो रहा है। प्रतिशत के नाते आंकना चाहे तो 99.99 % विश्वविद्यालयीन साहित्यिक अनुसंधान कार्य कलापक्ष को छोड़कर चल रहा है। ऐसा होना साहित्य के लिए कोई खतरा निर्माण नहीं कर रहा है पर अनुसंधात्मक गतिविधियों का खात्मा जरूर कर रहा है। साहित्यिक दुनिया को समीक्षक आधार दे रहे हैं। समीक्षक साहित्यिक कृतियों का सही रूप में कलापक्षीय मूल्यांकन कर उसकी खुबियों और कमियों को आंक रहे हैं, अर्थात् भला कर रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि शोधार्थी और शोध-निर्देशक क्या कर रहे हैं?
        साहित्य के कलापक्षीय अनुसंधात्मक गतिविधियों पर प्रकाश डालने वला आलेख 'सम्यक' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यहां उसका एक ही परिच्छेद है। पूरे आलेख की लिंक आगे दे रहा हूं। साहित्यिक अनुसंधान और कलापक्ष - डॉ.विजय शिंदे

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

पुत्रशोक में विह्वल पिता की करुण गाथा

पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार

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     ‘देहरी के पार’ विवेकी राय का उपन्यास है। चिर-परिचित ढंग और और अपनी उपन्यास शैली पर अड़िग रहकर लिखा गया उपन्यास। अपनी करुण गाथा का चित्रण कर आंतरिक दुःख को हल्का करने का प्रयास। उपन्यास में खुद विवेकी राय अपना दुःख, दर्द, व्याकुलता, आक्रोश... सामने वाले को बता रहे हैं और सामने वाला भी मूक सुनते जा रहा है। सुनने वाले के सिर्फ कान जगे हैं। शरीर के बाकी अवयव अचेतन अवस्था में अपना अस्तित्व खो बैठे हैं। आंखों के आगे बार-बार अंधेरा छाने लगा है। निरंतर बहते आंसू, बार-बार आंखों की ओर उठती मुट्ठियां लेखक के दुःख में शरीक होना चाहती हैं। पुत्र वियोग में जलते-भुनते, तड़पते, आकुल-व्याकुल होते पिता की करुण गाथा का वर्णन करने वाला उपन्यास ‘देहरी के पार’ हिंदी का किसी लेखक द्वारा पुत्र वियोग में लिखा जाने वाला उल्लेखनीय उपन्यास है। समय की असोचनीय खिलवाड़ विवेकी का अंतर-बाह्य झकझोर देती है। पारिवारिक व्यवस्था चकनाचूर होती है। परिवार की जिम्मेदारियों का भार अपने बड़े पुत्र ज्ञानेश्वर पर सौंप निश्चित होकर साहित्य सेवा में जुटे विवेकी राय अकल्पनीय, अविश्वसनीय हादसे से आक्रंदित होते हैं। शिवरात्रि के दिन शिव-पूजा करके वापस लौटने वाले शिवभक्त बच्चे का परमात्मा में विलीन होना नकारते विवेकी राय भगवान की ओर प्रश्नांकित दृष्टि से ताक रहे हैं। अनुत्तर यात्रा, अस्तित्व, आभास, माया और उत्तर यात्रा इन पांच अध्यायों में विभाजित उपन्यास पाठक को अकल्पनीय घटना का वास्तव होना बताता है आगे पढ़ें: रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - देहरी के पार

रविवार, 7 दिसंबर 2014

घने-काले ‘अंधेरे में’ नितांत अकेला

      
      'लेखनी' के नए अक्तूबर-नवंबर के अंक में नया आलेख प्रकाशित हुआ है। मूल आलेख पढना चाहते हैं तो उसकी लिंक है - घने-काले ‘अंधेरे में’ नितांत अकेलाः विजय शिंदे वैसे मूल आलेख जैसे हैं वैसे निचे जोडा गया है।

  मनुष्य इस दुनिया में बच्चे के रूप में मां के पेट से जब जन्म लेता है तब वह दुनिया से परिचित नहीं होता है। अपनी किलकिली आंखों से वह दुनिया का परीक्षण करना शुरू कर देता है। एक-एक चीज उसके आंखों से होकर दिमाग में अंकित होना शुरू करती है। कहा जाता है कि दुनिया बड़ी जालिम है।अर्थात् इसकी जालिमता के भी कुछ दृश्य, घटनाएं धीरे-धीरे वह पहचानने लगता है। देर लगती है, परंतु दुनियादारी से जुड़े हर आयाम से वह परिचित होने लगता है। जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ने लगती है वैसे-वैसे उसका और अधिक दुनिया से परिचय होता है। अच्छी-बुरी सारी स्थितियों से वाकिफ भी होता है। दुनिया की गुत्थियां, पेचिदगियां और अनसुलझे प्रश्नों के साथ उसकी एक लंबी लडाई शुरू होती है और वह एक भयानक अंधेरे मेंप्रवेश करने लगता है। जो बच्चा बचपन में भय नामक चीज से बिल्कुल परिचित नहीं होता, वहीं बडा होने पर छोटी-छोटी चीजों से भयभीत होने लगता है। सामाजिक परिस्थितियां उसके मन पर जबरदस्त दबाव डालती है कि उसका मन आतंकित हो उठता है। लगता है, इंसानों से भरी दुनिया इंसानों के बिना जी रही है। एक तरफ भरनाभी है और भरकर खालीपनभी है। विपरीत परिस्थितियों के जाल में फंसा आदमी विभिन्न अंतरों, मत-मतांतरों, दीवारों, मुश्किलों, विवादों, वर्ण-व्यवस्थाओं, जाति-व्यवस्थाओं, धर्म-संप्रदायों, आर्थिक विभिन्नताओं, शक्तियों... में फंसकर दिग्भ्रमित होता है। आकाश की ओर हाथ-आंखें उठाए अपने-आपको स्थिर बनाने की कोशिश करता है। पैर डगमगाने लगते हैं, सिर चकराने लगता है, शरीर रोमांचित होता है, दिल की धड़कने बढ़ने लगती है और मन भयभीत होकर कंपकंपाने लगता है। वह एक ऐसी मानसिक अवस्था में पहुंचता है कि उसे दुनिया से ही भय लगने लगता है। अपने आस-पास से भय लगने लगता है। एक ऐसे घुप्प अंधेरे मेंउसकी तकलीफदेय छटपटाहट शुरू होती है, जो अन्य देख नहीं सकते हैं, केवल और केवल वह अकेला देख सकता है। फिर उस अकेलेपन से उसे और अधिक भय निर्माण होता है।
देश-दुनिया के युवक आज जिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, वह परिस्थितियां उन पर बहुत अधिक दबाव डाल रही है। भूतकाल से ताकत नहीं, वर्तमान संघर्षभरा है, दबाव डाल रहा है और भविष्य का कोई ठिकाना नहीं है। असंदिग्धता से भरा पूरा माहौल युवकों के सामने प्रश्न बनकर खडा है। जो निश्चित मकाम तक पहुंचा है, या अपनी जरूरतों को पाने में सक्षम है, वह इस भय से शायद ही परिचित हो। परंतु दांवे के साथ कहा जा सकता है कि कभी वह भी दबावों को झेलता हुआ इन स्थितियों से गुजरा होगा। कम से कम इन दबावों ने उसे एक क्षण के लिए ही सही भयभीत किया होगा। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिससे युवकों को गुजरना ही पड़ता है। ऐसी स्थितियों में जो अपना बैलंस बनाने में सफल होगा, वह इस भय से मुक्ति पाने में सफल होता है। इसका कालखंड़ दो बरस, पांच बरस, या दस बरस का है... बताया नहीं जा सकता, पर होता जरूर है। यह एक ऐसा अंधेरा रास्ता है जिससे हर एक को गुजरना ही होता है।
जीवन में ऐसे कई घटना-प्रसंग आते हैं जो हमारी यादों पर छाप छोड़ते हैं- कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ भय निर्माण करने वाले। इंसान है, तो ऐसी स्थितियों से गुजरना तो है ही। इंसान है, तो बीमार भी पड़ना है। ...पांचवी कक्षा में था तब की बात है। बुखार से शरीर जले जा रहा था। एक सप्ताह हो गया, स्कूल की तरफ कदम उठे नहीं थे। घर में पड़े-पड़े खपरैल छत देख-देखकर मन उकता चुका था। थोड़ी-सी आंख लगी कि भयानक सपनें आतंक पैदा कर देते थे। तो बुखार बुरे सपनों को आमंत्रित करता है और वह भी इतने भयानक कि पूछे नहीं। बुखार, ऊपर से भयानक सपनें। गर्मी के दिन। कुलमिलाकर पसीना-पसीना और बिछावन भय से गीला। भाई स्कूल में। मां गाय-भैस को चराने ले जाती और पिताजी पास में ही चल रहे नए तालाब के लिए बांध पर मजदूरी करने निकल पड़ते। अकेलापन आतंक पैदा करते रहता। गर्मी और अंधेरे से छुटकारा पाने के लिए घास की छत वाले अगले हिस्से में बिछावन डाले रखा था। सुबह दस का समय था। हमारे घर के सामने से बांध पर काम करने वाले मजदूर जाया करते थे। कुछ बाहरी गांव से भी बुलाए गए थें और उनके पास मिट्टी और पत्थर ढोने के लिए गधे भी थें। जब ठीक था तब और जब बीमार था तब भी रोज आंखों के सामने से इनके आने-जाने का दृश्य गुजर जाता था। आंखें थोड़ी बंद, थोड़ी खुली। झपकी आ रही है और बुखार भी तेज। बढ़ते बुखार के साथ सामने से गधे अपने मालिक के साथ गुजर रहे हैं। एकदम अचानक एक गधा आक्रामक होकरहुं... हां, हुं...हांकरते चिल्लाने लगता है। कुदने लगता है। दुलत्थियां मारने लगता है और उसके पास से जाने वाले मेरे चाचा (अप्पा) को एक झटके के साथ अपने मुंह में पकड़कर गपागप चबाने लगता है। मैं भयभीत होकर बिस्तर से उठकर जोर-जोर से चिल्लाते हुए आंगन से होकर गधे की ओर भागने लगता हूं। मुझे दौड़ते हुए, चिल्लाते हुए देखकर मां भी मेरे पीछे दौड़ती है। मुझे पकड़कर गोद में उठाती है। शांत करने की कोशिश करती है। झपकी लगने से पहले गधे मेरे आंखों के सामने से गुजर रहे थें और इस समय आंख लगते ही वह भयानक सपने में तबदील होकर मेरे चाचा को चबा रहे थे, जिससे भयभीत होकर मैं चिल्लाते जा रहा था। खैर आज भी वह चाचा जिंदा है। हमसे अच्छी स्थितियां थी कारण फौज में नौकरी कर रहे थे। ठीक-ठाक चलता था। समय के चलते घमंड़, अहं और गर्व का गधा न केवल उन्हें उनके सारे परिवार को गपागप खाए जा रहा है।
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बी.. हो गया और एम.. हिंदी के लिए शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर में ऍडमिशन लिया। घर की स्थितियां बदली थी। बचपन में जो अर्थाभाव देखा था उसकी मार थोड़ी कम हो गई थी। कारण इस बीच बड़ा भाई फौज में भर्ती हो गया था। मेरी पढ़ाई उसी के बलबूते पर चल रही थी। वैसे खर्चा ज्यादा तो था नहीं परंतु सामान्य आर्थिक स्थितियां दबाव बना लेती ही है। जैसे-जैसे आगे पढ़ता जा रहा था वैसे-वैसे मन में अपराध भाव का भय भी बढ़ते जा रहा था। भविष्य की असुरक्षितता इस भय को और बढ़ावा दे रही थी। सामाजिक अशांतता, बेरोजगारी, शिक्षित युवकों का संघर्ष इस भय को सिंचते जा रहा था। होस्टल में एक समान उम्र के सारे दोस्त, सबकी स्थितियां वहीं। अनावश्यक तौर पर अनावश्यक दबाव। नवीन माहौल और गांव-घर से दूरी। मन में अनेक प्रकार के भय के साथ अशांति का भाव रातों की नींद हराम करते जा रहा था। खैर जैसे-तैसे नए परिवेश से गाड़ी आगे बढ़ रही थी पर मन अशांति से भरा था। होस्टल क्रमांक तीन रूम नंबर तेरह। चपरासी ने रूम की चाबियां हाथों में सौंपते हुए व्यंग्य और मजाकियां तौर पर कहा कि "क्या कमरा मिला है? तुम्हारी पढ़ाई के तीन-तेरह न हो जाए।" यह वाक्य बार-बार कानों में गुंजते हुए भय निर्माण कर रहा था।
कोल्हापुर जाते वक्त भाई ने टायमेक्स कि एक नई घड़ी दे दी थी। वैसी ही घड़ी उसने अपने लिए भी खरीदी थी। बड़े प्यार से उसे पहना करता था, परंतु मन में अपराध भाव का भय बढ़ते जा रहा था कि वह अपने पढ़ाई पर पैसे लगवा रहा है, भविष्य में इसका कोई लाभ होगा भी या नहीं? कारण मेरे जैसे अनेक युवक यहां पढ़ रहे हैं, इन सबको नौकरियां लग सकती है? इनके साथ मैं स्पर्धा कर पाऊंगा? अगर इसमें असफल रहे तो कौनसेअंधेरे मेंजाकर हमारी गाड़ी रूक जाएगी? मेस का खाना, किताबें, कपड़े, बिस्तर, घड़ी... सब कुछ उसका। उधारी पर उधारी चढ़ती जा रही थी और मन चितिंत भयभीत होते जा राह था। दिन तो जैसे-तैसे कट जाता था। दोस्त क्लास और किताबें। पर कहां से क्या शुरू करें? समझ में नहीं आ रहा था। लग रहा था जैसे भी हो छोटी-सी नौकरी लग जाए तो जिंदगीका बेड़ा पार होगा। लेकिनछोटी-सीभी कहीं नजर नहीं आ रही थी। अपने रूम पार्टनर के साथ एक प्रयास फौज में भर्ती होने के लिएभर्तीपूर्व प्रशिक्षणलेने का भी किया। वहां भी फेल हो गए। अर्थाभाव और दबावों के चलते शरीर इतना कमजोर हुआ था कि वह प्राथमिक मापदंडों में भी नहीं बैठ रहा था। न छाती उनके अनुकूल थी और न वजन। मायुसी के साथ वापसी। वहीं होस्टल का कमरातीन-तेरहऔर चपरासी के वाक्यों की गुंज। घड़ी सिरहाने टेबल पर रखकर लोहे की खाट पर सो जाता था। पार्टनर और मेरे बीच में टेबल। उसकी और मेरी चिंताएं एक समान। लाईट बंद। घुप्प काला अंधेरा। चारों तरफ शांति पर मन अशांत। जैसे जैसे रात चढ़ने लगती वैसे-वैसे भयानक शांति अंदर और बाहर भरने लगती। जिसको दिन में नहीं सुन सकते वह रात में बड़े आराम के साथ सुना जा सकता है। दिल की धड़कनें, सांसों की आवाजें, और... और सिरहाने रखी टायमेक्स घड़ी की टिक-टिक। भय, डर और अनजानी चिंताओं की हथौड़ियों की चोटों से दिल की धड़कने बढ़ती थी और बिस्तर पर बेचैन होकर उठ बैठता था। घने-कालेअंधेरें मेंनितांत अकेला, केवल घड़ी की टिक-टिक के साथ डरकर, सहमकर, भयभीत होकर। यह कौन-सा भय है? यह कौनसा अपराध भाव है? मेरा मन मुझे ही सवाल करते जाता है और उससे भयभीत होकर सिर चकराने लगता है। सिद्धांतवादी मन परिस्थितियों के तले दबने की तड़प से छटपटाते जाता है। मुक्तिबोध कीअंधेर मेंकविता की भांति
"ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!
उदरंभरि बन अनात्म बन गए,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गए,
किसी व्यभिचारी के बन गए बिस्तर,
दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर,
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!
बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गए,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुंह मोड़ गए,
बन गए पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी मां को हकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य--त्याग दिए,
हृदय के मंतव्य--मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फंस गए,
अपने ही कीचड़ में धंस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम..."

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

विवेकी राय का समर शेष है


विवेकी राय का समर शेष है
 विवेकी राय

        विवेकी राय की पहली प्रकाशित पुस्तक ‘अर्गला’ (1951) कविता संग्रह है। परिस्थितिवश कविता के बीच से उपजता गद्य लेखक आगे बढ़ते हुए हिंदी साहित्य की अमूल्य सेवा करता है। पत्रकार और अध्यापक रहे विवेकी राय का अनुभव जगत् अभिव्यक्ति पाकर हिंदी साहित्य में साकार हो उठा है। भोजपुरी के प्रति विशेष प्रेम होने के कारण उस भाषा में भी उन्होंने कई किताबों का सृजन किया है। गांव उनका आत्मीय रहा है। अतः उन्होंने गांव की गलियों में घूमते हुए विषयों को उठाकर एक से बढ़कर एक साहित्यिक कृतियों की निर्मिति की है आगे पढ़ें: रचनाकार: विजय शिंदे का आलेख - विवेकी राय का समर शेष है

बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

किसनगढ़ के शोषण परंपरा की शिनाख्त





                   सृजनकर्ता सृजन क्यों करता है? साहित्य का उद्देश्य क्या है? यश, कीर्ति, मनोरंजन, रुपए कमाना, समाजहित करना या और कोई? अब साहित्य का क्षेत्र सीमित नहीं रहा है, उसमें परिवर्तन हो गए हैं। अनेक विधाएं और विधाओं के अंतर्गत कई प्रकारों में लेखन हो रहा है। उपन्यास विधा में चर्चित बना प्रकार आंचलिक उपन्यास। पाठक, समीक्षक के साथ हर एक को आह्वान करता आंचलिक उपन्यास। इसे बांचना, गुत्थियां सुलझाना, उद्देश्य को पकड़ना, लेखकीय पीड़ा की व्याख्या करना, भाषा के सौंदर्य का विश्लेषण करना, पात्रों के आत्मा की गुंज सुनना... आदि-आदि ‘चैलेंज’ बनकर अंतरबाह्य झकझोर देता है। वर्तमान हिंदी साहित्यकारों में, लेखन करने वाले आंचलिक लेखकों में अग्रणी लेखक के रूप में संजीव को पहचाना जाता है। इनका प्रत्येक उपन्यास आंचलिकता के अनछुए विषयों को लेकर उठता है और उस संसार की विड़ंबनाएं सामने रखता है। यह विड़ंबना उस गांव, आंचल, प्रदेश या किसी विशिष्ट क्षेत्र की होती है परंतु लेखकीय (आंचलिक लेखकों की) विशेषता यह होती है कि वह सीमित होकर व्यापक दर्शन कराती है। कृष्ण ने कुरुक्षेत्र पर खड़े होकर अर्जुन को विराट दर्शन कराए थे। आज प्रत्येक आंचलिक लेखक जीवन की दुर्गम युद्धभूमि पर खड़ा होकर मनुष्य के कई रूपों के दर्शन कराकर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। संजीव भी ‘किसनगढ़ के अहेरी’ उपन्यास से ‘देखिए, सोचिए और चेतिए का आह्वान’ करते हैं। आगे पढ़ें: रचनाकार: पुस्तक समीक्षा – किसनगढ़ के अहेरी