‘धूमिल’ की कई कविताओं में रह-रहकर ‘आदमी’ आ
जाता है और आदमी यह शब्द ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ का प्रतिनिधित्व करता है।
1947 को आजादी मिली और हर एक व्यक्ति खुद को बेहतर बनाने में जूट गया। देश
विभाजन के दौरान आदमीयत धर्मों के कारण दांव पर लगी थी। विभाजन के बाद दो
अलग-अलग राष्ट्र हो गए पर एकता गायब हो गई, हर जगह पर आदमी आदमी को कुचलने
लगा। आजादी के बाद जो सपने प्रत्येक भारतवासी ने देखे थे वह खंड़-खड़ हो गए
और उस स्थिति से निराशा, दुःख, पीडा, मोहभंग, भ्रमभंग से नाराजी के शब्द
फूटने लगे। इन स्थितियों में हर बार इंसानियत, मानवीयता और आदमीयत दांव पर
लगी, वह चोटिल होकर तड़पने लगी तथा उसे तार-तार किया गया उसका शरीर चौराहे
पर टांगा गया। धूमिल की कविता में इसी आदमी का बार-बार जिक्र हुआ है। 'रचनाकर' में इन्हीं विचार और विवेचन के साथ धूमिल की कविता पर आलेख प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक दे रहा हूं। लिंक है -विजय शिंदे का आलेख - धूमिल की कविता में आदमी प्रस्तुत आलेख 'रिसर्च फ्रंट' शोध पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक है - http://www.researchfront.in/02%20APR-JUNE%202013/7%20Dhumil%20ki%20kavita%20me%20aadami%20-%20Dr.pdf
मेरे ब्लॉग पर स्वलिखित हिंदी भाषा की रचनाएं हैं, जिसमें समीक्षात्मक आलेख, लेख,अनुवाद और सृजनात्मक रचनाएं हैं। साथ ही इस ब्लॉग पर ई पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य के लिंक भी मौजूद है। आप रचनाओं को पढने के लिए दाएं 'रचनाएं' में जाकर मनपसंद विधा को क्लिक करें। सीधे ब्लॉग पर वह रचना या उसकी लिंक आएगी। लिंक पर दुबारा क्लिक करने पर मूल ई-पत्रिका में प्रकाशित रचना तक आप पहुंच सकते हैं।
शनिवार, 26 अक्टूबर 2013
धूमिल की कविता में आदमी
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