रविवार, 26 अगस्त 2018

बारुद के ढेर पर


   विश्व में भारत की प्रतिमा अहिंसावादी और शांतिप्रिय देश के नाते है। यह सही भी है क्योंकि भारत का इतिहास यहीं बयां करता है। लेकिन आज-कल जो कुछ घटनाएं देशभर में घटित होती है, उसे व्यापक जातिवादी और धार्मिक रंग दिया जाता है। भारतवासी इस रंग में रंग भी जाते हैं, तब अहिंसावादी और शांतिप्रिय विचार प्रणाली को ठेंस पहुंचती है। भारत के भविष्य और विकास गति को असुरक्षित करने का कार्य जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें कर रही है। इस विषय को लेकर कई लोगों ने, कई विचारकों ने और कई समाज हितैषियों ने लिखा है। मैं किसी अलग बात को आपके सामने रख रहा हूं ऐसी बात नहीं। बस सबके मन में जो बातें उठ रही है उसे ही दुबारा उठा रहा हूं या युं कहे कि दोहरा रहा हूं। लेकिन यह दोहराव जरूरी है, इन विचारों का बार-बार चिंतन करना, कागज पर उतरना... जरूरी है। जिन घटनाओं से हम लोग आहत होते हैं, घायल होते हैं उससे ऐसे लगता है कि क्या हम लोग, हमारा समाज, हमारा देश बारुद के ढेर पर खड़ा है? कभी ऐसे भी लगता है कि हम लोग ज्वालामुखी के शिखर पर खड़े हैं। ऐसी स्थिति में बारुद और ज्वालामुखी के फटने का खतरा हमेशा बने रहता है।
यह विचार आज हमारे-आपके मन में उठने का कारण यहीं है कि सामाजिक मनमुठाव कहीं--कहीं कम होते जा रहा है। छोटीसी घटना आग बन जाती है और दो समाज, दो जातियां, दो धर्म, दो देश एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। इन दोनों का दोहरापन समाज की शांति को भंग करने पर आमदा होता है। हमारा बचपन एकता की ताकतवाले कई पाठ, कई कहानियां, कई निबंध सुनते-लिखते गुजरा है, परंतु असल जिंदगी में हमेशा फुट, अलगाववाद का ही रास्ता अख्तियार लिया है। एक भाई दूसरे के साथ रहना नहीं चाहता, बेटा बाप के साथ रहना नहीं चाहता और बाप बेटे के साथ रहना नहीं चाहता। खून के रिश्ते भी एक-दूसरे के विरोध में दुश्मनी पाले बैठे हैं, ऐसी स्थिति में दो जाति और दो धर्मों की दोहाई देना तथा एकता की बात करना मूर्खतापूर्ण और मजाकिया ही लगेगा! खैर समाजहित और देशहित के लिए ऐसी मूर्खताएं बार-बार करनी चाहिए, इसलिए कर रहे हैं। आज इन विचारों की पृष्ठभूमि में भीमा-कोरेगांव की घटना है, जिससे दो समाज और दो जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी हो गई, मारने-मरवाने पर उतारू हो गई। जिन दृश्यों को खबरों में देखा, समाचार पत्रों में पढ़ा उससे कई गुना भयानक दृश्य सोशल मीडिया में आग की तरह फैलते भी देखे हैं। आज भी इन दृश्यों को समाज विघातक प्रवृत्ति के लोग सोशल मीडिया में चटखारे के साथ प्रसारित करने का काम करते हैं। इन पर कोई पाबंदी नहीं? मजे लिए जा रहे हैं, आग लगाकर, तोड़-फोड़ करके, खून-खराबा करके। भयानक है। इतनी बड़ी आबादीवाले देश में इंसानी जिंदगी कीड़े-मकौड़ों जैसी बन गई है। कहानियों में पढ़ा-सूना, फिल्में में भी देखा कि एक बुरी प्रवृत्ति, बुरे इंसान को कितनी बार भी मारने की कोशिश करें मरता ही नहीं, उल्टा उस पर जितनी बार हमला करें, खत्म करने की कोशिश करें, वह उतनी ही ताकत के साथ उठ खड़ा होता है। वैसे ही भारत की भरपूर आबादी के बीच यह प्रवृत्ति एक राक्षस की तरह बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में बारुद के ढेर परखड़े होने का एहसास होता है। भारत के प्रसिद्ध वकील ऍड. उज्ज्वल निकम जी ने इसीलिए तो कहा कि अब यहां से आगे मैं जातिगत रंगोंवाले मुकदमों की पैरवी नहीं करूंगा। मेरी कोशिश रही है कि सच्चाई की जीत हो, अपराधी को सजा हो लेकिन देखा है कि पराजीत पक्ष हमेशा अपने अपराधों को नजरंदाज कर मुझे ही जातिवादी या जातिविरोधी साबित कर रहा है...एक प्रसिद्ध सरकारी वकिल का इस कदर अभिव्यक्त होना सामाजिक बिखराव और बिगड़ाव को बता देता है। सच्चे मायने में आज समाज में स्वार्थ, हिंसा, आक्रोश, दुश्मनी, अशांति, भयावता, अपराध... भरा पड़ा है। कुछ दिनों की शांति के बाद छोटीसी घटना बड़ी दुघर्टना का कारण बनती है, तो इसका एहसास बार-बार होता है कि हम लोग बारुद के ढेर पर खड़े हैं।प्रस्तुत आलेख 'रचनाकार'  के अगस्त अंक में प्रकाशित हुआ है। आगे पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें -  बारुद के ढेर पर 
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