मंगलवार, 9 जुलाई 2013

कस्तूरी कुंड़लि बसैं, मृग ढूंढ़े बन माहिं


कस्तूरी कुंड़लि बसैं, मृग ढूंढ़े बन माहिं

आदमी प्रकृति का अद्भुत चमत्कार है। अनेक ताकतों से भरपूर है पर आत्मा हमेशा अधूरी रही है। वह अपने भीतरी अंतर में झांकने की अपेक्षा बाहर ही झांकने लगता है और बाहरी दुनिया की चकाचौंध, आकर्षण, माया, मोह, आड़ंबर... में आदमीयत भूल जाता है। लंबी दौड़ और अंधी भूख शुरू होती है; वह कभी थमने का नाम नहीं लेती। प्रश्न उठता है ऐसा क्यों होता है, इंसान भ्रमित होकर अनावश्यक चीजों के पीछे क्यों दौड़ने लगता है? ऐसी कौन-सी बुद्धि भ्रष्टता है कि वह उसे भीतर झांकने नहीं देती, बाहर की ओर उन्मुख होता है। अनावश्यक बातों में अपने सुख और शांति को तलाशने लगता है। साधारण और सरल बात है, समझता भी है कि ‘मैं गलत कर रहा हूं’ तो भी आंखें बंद किए बाहरी दुनिया में दौड़-धूप क्यों? साधु-संतों ने बताया, पौराणिक और आधुनिक ग्रंथों ने बताया है, कई बार पढ़ने में भी आता है तो फिर आंखें होकर अंधा बन ठेंस खाना कहां की बुद्धिमानी है।



मिडलैंड यु.के. से प्रकाशित 'लेखनी' ई-पत्रिका की लिंक आपको दे रहा हूं जिसके परिचर्चा स्तंभ में 'कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे बन माहिं' आलेख छपा है। लिंक है paricharcha - LEKHNI-लेखनी 
JULY-2013-HINDI






आशा है आपको लेख पसंद आएगा।
                                                                                  
                                                                                   डॉ.विजय शिंदे


'लेखनी' में प्रकाशित प्रस्तुत आलेख पाठको के लिए भेज रहा हूं कारण लेखनी का नया अंक निकले के बाद प्रस्तुत आलेख आपको पढने मिलेगा नहीं।


 परिचर्चा






कस्तूरी कुंड़लि बसैं, मृग ढूंढ़े बन माहिं


         आदमी प्रकृति का अद्भुत चमत्कार है। अनेक ताकतों से भरपूर है पर आत्मा हमेशा अधूरी रही है। वह अपने भीतरी अंतर में झांकने की अपेक्षा बाहर ही झांकने लगता है और बाहरी दुनिया की चकाचौंध, आकर्षण, माया, मोह, आड़ंबर... में आदमीयत भूल जाता है। लंबी दौड़ और अंधी भूख शुरू होती है; वह कभी थमने का नाम नहीं लेती। प्रश्न उठता है ऐसा क्यों होता है, इंसान भ्रमित होकर अनावश्यक चीजों के पीछे क्यों दौड़ने लगता है? ऐसी कौन-सी बुद्धि भ्रष्टता है कि वह उसे भीतर झांकने नहीं देती, बाहर की ओर उन्मुख होता है। अनावश्यक बातों में अपने सुख और शांति को तलाशने लगता है। साधारण और सरल बात है, समझता भी है कि ‘मैं गलत कर रहा हूं’ तो भी आंखें बंद किए बाहरी दुनिया में दौड़-धूप क्यों? साधु-संतों ने बताया, पौराणिक और आधुनिक ग्रंथों ने बताया है, कई बार पढ़ने में भी आता है तो फिर आंखें होकर अंधा बन ठेंस खाना कहां की बुद्धिमानी है। कबीर ने सबको सजग करते लिखा था –

        "कस्तूरी कुंड़लि बसैं, मृग ढूंढ़ै बन माहिं।
         ऐसैं घटि घटि राम हैं, दुनिया देखै नाहिं।।"

मनुष्य के शरीर में आत्मा बसती है और आत्मा ही परमात्मा का अंश है तो भीतर झांककर परखना जरूरी है। आस-पास की सजीव सृष्टि में ईश्वरीय अस्तित्व को तलाशना चाहिए पर ऐसा होता नहीं। माया, मोह, इच्छा, आकांक्षा, स्वार्थ... में फंसा इंसान सजीव, लौकिक, आत्मिक बातों में सुख तलाशता नहीं और वह ऐसे जाल में फंसता है कि पूछो मत; हाथ लगता है केवल दुःख। सुगंध तो अपने हृदय-मन में बैठी है उसको तलाशे। सारी दुनिया अंधी हो संसार के कण-कण में बसे ईश्वरीय अस्तित्व को नकारे जा रही है; आधुनिकता में पढ़कर नव-नवीन प्रयोग के साथ भौतिक आकर्षण में अंधी हो गई है। न खत्म होने वाली दौड़ के पीछे अपनी जान खपा रही है। ऐसे में संतों, विचारवंतों, समीक्षकों... के साहित्य का पूणर्पाठ कर सच्चाई और वास्तव तलाशना जरूरी है।

       आदिकालीन और भक्तिकालीन संतों ने ही नहीं तो सारी भारतीय और विश्वभाषा के लेखकों ने इंसान की अंधीतलाश पर प्रकाश डाला है। छोटी कविताओं और वाक्यों के साथ बडे-बडे ग्रंथों के लेखन से इंसान की अनजानी दौड़ पर प्रकाश डाल वास्तविकता से परिचित करवाया है। जन्म लेते ही बच्चे को संस्कार, परिवार और समाज ऐसे रास्तों पर खडा करता है कि उसे भीतर झांकने का मौका ही नहीं मिलता है। यात्राएं दर यात्राएं वह जिंदगी का लंबा सफर तय करता है। ऐसी चीजों की तलाश में निकलता है जो उसकी नहीं होती। सही तलाश और यात्रा भीतर की होनी चाहिए वह होती नहीं। कभी-कभार एकांत में ऐसी स्थिति पैदा भी हो जाए तो वह घबडाकर अपने आपको पहचानने से इंकार कर देता है। अपनी यादें, विवेक, बुद्धि, आत्मा की आवाजें... सबकुछ भूल जाता है। मुनिश्वरलाल चिंतामणि ‘अपनी जमीन की तलाश’ में इन स्थितियों को पकड़ते लिखते हैं –

       "बंधुवर !
        क्या इंद्रधनुष की उस शीतल छाया की
        अब तुम्हें याद नहीं आती ?
        क्या तुम्हें अब अपनी जमीन की तलाश नहीं ?"

        सहज और सुंदर काव्य पंक्तियां है जो भीतर झांकने के लिए मजबूर करती है। इंसान को क्या होता है पता नहीं पर थोडे-से दिन बदले कि अपने आपको दुनिया का मालिक समझने लगता है। थोडी शक्ति के भरौसे देवता समझने लगता है। पर जहां से उठा उस जमीन को भूलना जमीन के साथ अन्यायकारक और बेईमानी होगी। हालांकि आदमी को मिट्टी से निर्मित होकर मिट्टी में ही मिलना है, तो उसकी याद तो आनी ही चाहिए। पौधों का रोपण उसके अनुकूल जमीन में ही होता है और उचित जमीन की भी तलाश होती है, वैसे ही आदमी भी अपने जमीन कीतलाश करें यहीं बेहतर है।

        सर्वसमावेशकता, व्यापकता, त्याग, प्रेम, सेवा, ईमानदारी... मनुष्य की खूबसूरती है। अपना तो कोई भी सोचेगा पर दूसरों का सोचना इंसान को उठाता है, उसकी खूबसूरती को निखारता है। वर्तमान युग में ऐसे दृश्य बहुत कम दिखाई देते हैं। स्वार्थ और भ्रष्ट आचरण में लिप्त लोग नैतिक मूल्यों को जाते-जाते लात मार रहे हैं और उस पर थूंकते भी जा रहे हैं। ऐसे दृश्य, घटनाएं बहुत पीडा देती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिंदगी में मस्त रहना चाहता है। अपेक्षा है कि गमले के भीतर का सूरक्षित पौधा बनूं, खूबसूरत फूल देता रहूं; परंतु बरगद बन छांव देने की मंशा कम होते जाना इंसानीयत को पराजीत करने वाला होगा। नींव की ईंट होना, छांव होना आदि आदर्श क्या किताबों में ही बंद रहेंगे ? तलाश है त्याग, सर्वसमावेशकता, व्यापकता और प्रेम की। आधुनिक हिंदी कवि कविता गौड़ के शब्दों में – 

       "इसीलिए आज भी है तलाश सबको
        बूढे बरगद की, छांव की,
        पक्की नींव की, ईंट की,
        त्याग में ज्ञान के प्रकाश की।"

        इंसान इंसान है यह कभी भूले नहीं। वह अपने आपको प्रकृति में सबसे ताकतवर मानता है लेकिन यह उसका भ्रम है। प्रकृति ने जैसे भेजा है वैसे रहकर उसके साथ जुड़कर कई समझौतों के साथ उसे धक्का दिए बिना जीना उसके लिए फायदेमंद है। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं नव-नवीन कल्पनाओं को तलाशते-तलाशते वह कब सीमाओं को लांघ जाता है उसे पता भी नहीं चलता; या पता चल रहा है तो बेफिक्री के साथ नजरंदाज कर देता है। ऐसी स्थिति भविष्य के लिए खतरनाक है और अपने पैर पर कुल्हाडी मारने जैसा भी। छोटी सफलताएं मानो उसे स्वर्ग प्राप्ति का एहसास दिलाती है परंतु असल में ऐसा होता नहीं। अपने बौनेपन की पहचान भूचाल, अकाल, बारिश, तूफान... आदि प्राकृतिक आपत्तियों में हो जाती है। गजलकार और कवि ज्ञानप्रकाश विवेक मनुष्य की इस अंधी तलाश को रोकने के लिए लिखते हैं –

       ''अभी हम चांदनी का जिस्म छू सकते नहीं हर्गिज।
        अभी तो धूप के पानी से हमने हाथ धोने हैं।।
        हवाएं, धूप, पानी, आग, बारिश, आसमां, तारे।
        यहीं कंबल हमारे हैं, यहीं अपने बिछौने हैं।।"

        अंधी तलाश से वास्तव की ओर मुखरित होना अत्यंत जरूरी है। भटकाव पाटकर शब्द और सत्य को भी पकड़ना जरूरी है। घमंड़, स्वार्थ, गर्व छोड़ इंसानी धरातल पर उतरना भी आवश्यक है। एक नहीं कई विद्वानों ने बताया है कि हमारा संसारिक अस्तित्व क्षणभंगुर है पर इंसान स्वीकारने की मानसिकता में है ही नहीं। समय आ चुका है बाहरी दुनिया की अपेक्षा भीतरी तलाश हो। गजानन माधव मुक्तिबोध प्रत्येक व्यक्ति को कवि मान सजग कर रहे हैं कि जीवन गति और स्वर को पकड़कर सच्चाई की तलाश करें –

       "क्षणभंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर
        दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर ?
        इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर,
        सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर
        तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्मल मानव के घर-घर
        ज्योतित हो मुख नवम आशा से, जीवन की गति जीवन का स्वर।"

        समय है, मौके हैं तो इंसान को जागृत होना चाहिए। मानवीयता सर्वश्रेष्ठ धर्म है और भूतकाल में हो गई गलतियों से सीख लेकर अंतरआत्मा की पुकार को इंसान सुनेगा और सही कदम उठाएगा यहीं सबकी अपेक्षा है। अपेक्षा पर वह खरा उतरे। हमारे भीतर ही सबकुछ है बाहर तलाश करने की जरूरत है नहीं। कस्तूरी की सुगंध तो अपने भीतर ही है। ‘कस्तूरी कुंड़लि बसैं, मृग ढूंढ़ै बन माहिं’ कबीर के इस पद से हम थोडी सीख ले तो सुगंध तलाशने की जरूरत पडेगी नहीं और बेहतर जिंदगी के रास्ते भी खुलते जांएगे।


डॉ. विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद – 431005 (महाराष्ट्र)
ब्लॉग -  साहित्य और समीक्षा




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