मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

भ्रम और निरसन - देखेंगे जीत किसकी होती है?


भ्रम और निरसन 

मूल लेखकडॉ. नरेंद्र दाभोलकर, अनुवाद डॉ. विजय शिंदे

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,  

प्रथम – 2018, मूल्य – 295, पृष्ठ – 152, 

ISBN: 978-93-88183-58-1


देखेंगे जीत किसकी होती है?

हमारा देश विज्ञानवादी, आधुनिक और प्रगत होने का ढिंढोरा पीटता है, लेकिन असल में हम अपने भीतर झांककर अपने आप से पूछे कि हम वैसे हैं? भारत के दूर-दराज पिछडे इलाकों से लेकर महानगरों और मेट्रो सिटियों में जिस प्रकार के भ्रम, अंधविश्वास फैले हैं तथा पाले जा रहे हैं वह हमारे विज्ञानवादी, आधुनिक और प्रगत होने के दांवों पर कालिख पोत रहे हैं। शिक्षा पाने से कोई विवेकवादी बनता नहीं है। सामान्य से असामान्य व्यक्ति तक का नजरिया अगर विवेकहीन है, रूढि-परंपरावादी है, अंधविश्वासी है तो उसको बहुत बडी हानी पहुंच सकती है। अतः डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का जिंदगी के सारे चिंतन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इंसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षडयंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माडंबरी गढों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिंदू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिंदुओं के धार्मिक अंधविश्वासों के चलते एक सुधारक का खून किया गया। अर्थात बहुत दूर जाने की भी जरूरत नहीं है, डॉ. दाभोलकर का ऐसे लोगों से खून किया जाना भी विवेकहीनता का ही उदाहरण है। सत्य साईं, आसाराम, रामरहीम आदि पाखंडी लोग हमारे देश में स्थापित होते हैं, करोडों रुपए की संपत्ति से किसी हनिप्रित के साथ बाप-बेटी के रिश्ते को ताक पर छोडकर ऐयाशी की रासलीलाएं रचते हैं। यह किस प्रकार का धर्मप्रचार है? बडे-बडे सेलिब्रेटी भी ऐसे पाखंडी बाबाओं के सामने बडी लिनता के साथ गिरकर चुमा-चाटी करते हैं। सत्य साईं का एक अंध भक्त सचिन तेंदुलकर भी थे। क्या उन्हें पता नहीं था कि ऐसे पाखंडी बाबा के साथ जुडकर भारतीय समाज में एक आदर्श व्यक्ति के नाते हम कौनसा आदर्श रखने जा रहे हैं? ऐसे समय में बगले झांकना शुरू किया जाता है कि यह हमारी निजी जिंदगी है, लेकिन कोई भी सेलिब्रटी और आम व्यक्ति इस बात को ध्यान रखे कि जिस समय हमारा दहलिज के बाहर कदम पडता है और सामाजिक होते हैं तब हमारा निजत्व खत्म होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा वर्तन हमेशा विवेक के साथ ही हो।
हमें देखनेवाली हजारों आंखे होती हैं और हमारे वर्तन का उन पर जाने-अनजाने प्रभाव पडता है। ध्यान रहे कि हमारे अंधविश्वासभरी बातों को कोई फॉलो ना करे और उसका नुकसान भी ना हो। हमारे देश में धर्म, जाति, वर्ण, देव-देवता, रुढि-परंपरा, रहन-सहन, पहनावा आदि तमाम बातें निजी है, जरूर निजी है; इसका पालन भी करें; लेकिन कहां? अपने घरों में। दरवाजें के भीतर। जब दरवाजें से बाहर सामाजिक व्यक्ति के नाते हम कदम बाहर रखते हैं तब अपना सारा अविवेक घर में खूंटी पर टांग दे, अल्मारी में बंद कर दे और विवेकवादी बनकर बाहर निकले। एक सामान्य बात बहुत अहं है वह यह कि विवेकवादी बनने से हमारा लाभ होता है या हानि इसे सोचे। और जिस समय हमें लगता है कि हमारा लाभ होता है उस समय इन रास्तों पर चले। दूसरी बात यह भी याद रखे कि धर्माडंबरी, पाखंडी बाबा तथा झूठ का सहारा लेनेवाले व्यक्ति का अविवेक उसे स्वार्थी बनाकर निजी लाभ का मार्ग बता देता है, अर्थात उसमें उसका लाभ होता है और उसकी नजर से उस लाभ को पाना सही भी लगता है; लेकिन उसके पाखंड, झूठ के झांसे से हमें हमारा विवेक बचा सकता है। अगर ऐसा हो तो अपने-आप पाखंडी बाबाओं की दुकानें बंद हो जाएगी। हमारा समाज और देश विवेकवादी बनने के लिए तत्पर भी बन जाएगा। कल्पना करें इन सारे पाखंडों के बिना हमारा देश कितना तेजोमय बन जाएगा। ‘भ्रम और निरसन’ किताब इसी विवेकवाद को पुख्ता करती है। हमारे आंखों को खोल देती है और हमें लगने लगता है कि भाई आज तक हमने कितनी गलत धारणाओं के साथ जिंदगी जी है। मन में पैदा होनेवाला यह अपराधबोध ही विवेकवादी रास्तों पर जाने की प्राथमिक पहल है।
किताब के अंत में डी. एस. नार्वेकर गुरुजी का अंतिम ‘संदेश’ डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जी ने जानबूझकर जोडा है। कोई व्यक्ति विवेकवादी जीवन जीने के लिए कौनसी कोशिशें करता है और अपने बच्चों को उन्हीं रास्तों पर लेकर जाना है तो कौनसे त्याग करने पडते हैं, इसका लेखाजोखा यह संदेश है। वैसे यह संदेश नहीं तो ‘मृत्यु-पत्र’ है। नार्वेकर गुरुजी ने इसमें जो बातें लिखी उससे पता चलता है वे अपने बच्चों के नाम सारी दुनिया जिसके पीछे दौडती है वैसी संपत्ति छोडकर नहीं जा रहे हैं लेकिन वे जिस विचार संपत्ति के पीछे दौडे उसे देकर जा रहे हैं। विवेकवादी, सुधारवादी और प्रगतिवादी विचारों की संपत्ति किसी मां-बाप से अपने बच्चों के नाम मृत्यु-पत्र में छोडी जाना बहुत बडी बात है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि हमारे देश में किसी मां-बाप को इस प्रकार से पत्र लिखना पडता है, यह बहुत बडी दर्दनाक स्थिति का परिचायक है। बच्चों को विवेकवादी, सुधारवादी, प्रगतिवादी, विज्ञानवादी, ज्ञानवादी या तमाम मनुष्यों के लिए हितवादी बनाने का कार्य समाज का है, आस-पास के सामाजिक माहौल का है। सामाजिक माहौल अपनी भूमिका ठीक ढंग से निभा नहीं रहा है, नतिजन अपने बच्चों के भविष्य को लेकर मां-बाप चिंतित हो रहे हैं। अर्थात सामाजिक परिस्थितियों में चारों तरफ दुषितता है, प्रदूषण है, बदबू है, गंदगी है। जन्म होने से पहले ही ईश्वर, भगवान, देवी, देवता चित्र-विचित्र बातों का, तस्विरों का माहौल बच्चों के आस-पास इस प्रकार से बुना जाता है कि वह अपने मां के गर्भ में भी हाथ-पैर मारे तो उसे डर होता है कि कहीं गलती से इन कोटि-कोटि देवी-देवता की मूर्तियों को लात ना लग जाए! कितना पाखंड, कितनी विडंबना है कि हम आंख खोले तो कोई देवता-अल्ला-गॉड की झूठी तस्वीर दिख जाती है, कान खोले तो किसी आरती-पूजा-पाठ-अजान-प्रार्थना की ध्वनि सुनाई देती है और मुंह खोले तो देवी-देवता-ईश्वर-अल्ला-गॉड की ध्वनि निर्माण हो की कामना करते हैं। भाई...! बहुत भयानक है। हम कौनसे युग में जी रहे हैं। बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वह उंचे होहदों पर जाए, डॉक्टर-इंजीनिअर बने, वैज्ञानिक बने, बहुत... बहुत... बडा नाम कमाए; किन परिस्थितियों में; इन परिस्थितियों में? ऐसे माहौल में जो बने और टिके उनका अभिनंदन करना पडेगा, कारण विपरीत परिस्थिति में किसी को निर्माण होना है तो दोगुनी ताकद लगानी पडती है। इन बच्चों ने दोगुनी ताकद लगाई, तभी तो निर्माण हो चुके हैं। हम लोग रुढि-परंपरा और अंधविश्वासों के चलते अपने आपका नुकसान कर चुके हैं और अगली पीढी का भी नुकसान कर रहे हैं। बहुत हंसी आती है और दुख भी होता है कि किसी बच्चे के जन्मते ही उसके जीभ पर ओम, अल्ला, गॉड का नाम लिखने की कोशिश होती है। ऐसे नाम लिखने से कुछ होता नहीं है, यह सबको पता है, अगर होता तो दुनियाभर के चोर-डकैत, आतंकवादी... पैदा ही ना हो पाते। अगर ऐसा लिखने से सचमुच कुछ होता तो कोई मां-बाप अपने बच्चे की जीभ पर कोई यान, क्रिकेट की बैट, बॉल, फुटबॉल, हॉकी स्टिक, कलम-कागज, कुर्सी... आदि क्यों नहीं निकालता? मन की इच्छाएं अपना बच्चा बहुत... बहुत... बडा बन जाए, लेकिन उसके लिए जो परिस्थितियां निर्माण की जा रही है वह सारी देव-देवता-अल्ला-गॉड के पाखंडी रूपों की, झूठ-मिथ्या-फरेबों से भरी हुई? कमाल है? इत्ती-सी (इतनी-सी) बात हमारे भेजे में घुसती नहीं? इससे भला हमारे भेजे का पत्थर होना अच्छा होता?
खैर, जिसको जैसा जीना है वह वैसे जीए। लेकिन विवेकवादी और विज्ञानवादी बनाने का काम डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे कितने भी लोगों का खून हो, जारी रहेगा। अंधविश्वास उन्मूलन समिति और उनके कार्यकर्ताओं की अपेक्षा है कि हम सुधर चुके हैं और हमारे प्रयासों से एक व्यक्ति भी सुधर जाए तो इस आंदोलन की बहुत बडी सफलता मानी जाएगी। कितने भी संकट आए, कितने भी खून हो जाए, कितनी भी सरकारें और पुलिस व्यवस्था खून होते हुए आंखे बंद कर ले और चुप्पी साधे या हाथ पर हाथ धरे बैठे। प्रयास जारी रहेंगे। कोशिश होगी विवेकवाद को तराशने की, विज्ञानवाद के पुरस्कार की, आंखें खोलने की और संपूर्ण मनुष्य जाति के नुकसान को रोकने की; अधविश्वास उन्मूलन समिति का कार्य तो यहीं है, वह किसी को अपना दुश्मन नहीं मानती। उनके पास ऐसे पाखंडी लोगों से दोस्ती और दुश्मनी करने का समय ही नहीं है। वे अपने पाखंडी कामों में लगे रहे, अंधविश्वास उन्मूलन समिति अपना काम करती रहेगी। देखेंगे जीत पाखंडी, झूठे, फरेबी, परंपरावादियों की होती है या विवेकवादी, विज्ञानवादी, प्रगतिशील विचारों की होती है।

डॉ. विजय शिंदे

फिल्मों में कॅमरा का महत्त्व



फिल्म के निर्माण की अनेक महत्त्वपूर्ण कड़ियों में से दो अहं कड़ियां हैं - कॅमरा और संवाद। यह दोनों कड़िया अलग-अलग है, अतः यहां पर इनका स्वतंत्र विवेचन भी जरूरी है। कॅमरा तकनीकी कला है और संवाद सृजन प्रक्रिया के साथ जुड़नेवाली कला है। संवादों के माध्यम से कहानी को कथात्मक रूप से संवादात्मक और नाटकीय रूप प्राप्त होता है, जिसका उपयोग अभिनय के दौरान होता है। कॅमरा एक यंत्र है, परंतु उसकी सहायता से कॅमरामन ऐसी तस्वीरों को खिंचता है जो जीवंत होकर परदे पर धूम मचाती है। संवादों के साथ प्रत्येक हलचल को अपने भीतर समेटता कॅमरा दर्शकों की तीसरी आंख बनकर उभरता है। फिल्मों की व्यावसायिक और कलात्मक सफलता भी तस्वीरों की सूक्ष्मताओं और संवाद के आकर्षक होने पर निर्भर होती है।
        फिल्म में कॅमरा का काम शूट किए जा रहे प्रत्येक दृश्य को दृश्यांकित करना होता है। इसे चलाने के लिए निपुण और कुशल कॅमरामन की जरूरत होती है। कॅमरा का आधुनिक तकनीक से लदे होना, विशिष्ट एंगल के तहत चलना और कॅमरामन का कार्य निर्देशक की सूचनाओं का पालन करते हुए उनके मन में उठती तस्वीर को साकार रूप देना है। पिछले पाठ में लिखा है कि दुनिया में बहुत अच्छे निर्देशकों ने फिल्मी दुनिया में अपनी आरंभिक शुरुआत कॅमरामन से की है। उसका कारण यह है कि कॅमरामन आधा दर्शक और आधा निर्देशक बनकर अपनी सोच को आगे बढ़ाता है और तस्वीरों को विविध कोणों से खिंचने की कोशिश करता है। दुनिया में कॅमरा (सिनेमॅटोग्राफी) इस मशिन ने ही फिल्म निर्माण की प्रेरणा दी है। यहीं वह यंत्र है जो लेखक या पटकथा लेखक की कहानी को, छोटे-छोटे दृश्य, घटनाओं और प्रसंगों को पुरजों मे इकठ्ठा करता है। आगे चलकर वहीं पुरजें संपादकों के टेबल पर विविध प्रक्रियाओं के तहत संपादित होते हैं, जुड़ते हैं, विविध जगहों से कट होते हैं और ढाई-तीन घंटे की एक फिल्मी कहानी में उतरते हैं। आजकल बाजार में विविध प्रकार के बहुत अच्छे और कम कीमत में कॅमरे मिल जाते हैं जो दृश्यों को शूट करने का काम कर सकते हैं। लोगों के पास मोबाईल है और मोबाईल में भी अच्छे पिक्सल के कॅमरे बिठाए जाते हैं, जो फोटो तो खिंचते ही है साथ ही ऐसे कई दृश्यों को शूट कर सकते हैं जो एक फिल्म का रूप देने में सक्षम होते हैं। हां उसकी स्तरीयता और पिक्चर कॉलिटी कमजोर हो सकती है परंतु यह ध्यान रहे कि आरंभिक दौर में केवल हिलती-डूलती तस्वीरों को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। 'फिल्मों में कॅमरा का महत्त्व' आलेख 'रचनाकार'  के दिसंबर वाले अंक में प्रकाशित हुआ है। आगे पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें -फिल्मों में कॅमरा का महत्त्व

रविवार, 26 अगस्त 2018

बारुद के ढेर पर


   विश्व में भारत की प्रतिमा अहिंसावादी और शांतिप्रिय देश के नाते है। यह सही भी है क्योंकि भारत का इतिहास यहीं बयां करता है। लेकिन आज-कल जो कुछ घटनाएं देशभर में घटित होती है, उसे व्यापक जातिवादी और धार्मिक रंग दिया जाता है। भारतवासी इस रंग में रंग भी जाते हैं, तब अहिंसावादी और शांतिप्रिय विचार प्रणाली को ठेंस पहुंचती है। भारत के भविष्य और विकास गति को असुरक्षित करने का कार्य जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें कर रही है। इस विषय को लेकर कई लोगों ने, कई विचारकों ने और कई समाज हितैषियों ने लिखा है। मैं किसी अलग बात को आपके सामने रख रहा हूं ऐसी बात नहीं। बस सबके मन में जो बातें उठ रही है उसे ही दुबारा उठा रहा हूं या युं कहे कि दोहरा रहा हूं। लेकिन यह दोहराव जरूरी है, इन विचारों का बार-बार चिंतन करना, कागज पर उतरना... जरूरी है। जिन घटनाओं से हम लोग आहत होते हैं, घायल होते हैं उससे ऐसे लगता है कि क्या हम लोग, हमारा समाज, हमारा देश बारुद के ढेर पर खड़ा है? कभी ऐसे भी लगता है कि हम लोग ज्वालामुखी के शिखर पर खड़े हैं। ऐसी स्थिति में बारुद और ज्वालामुखी के फटने का खतरा हमेशा बने रहता है।
यह विचार आज हमारे-आपके मन में उठने का कारण यहीं है कि सामाजिक मनमुठाव कहीं--कहीं कम होते जा रहा है। छोटीसी घटना आग बन जाती है और दो समाज, दो जातियां, दो धर्म, दो देश एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। इन दोनों का दोहरापन समाज की शांति को भंग करने पर आमदा होता है। हमारा बचपन एकता की ताकतवाले कई पाठ, कई कहानियां, कई निबंध सुनते-लिखते गुजरा है, परंतु असल जिंदगी में हमेशा फुट, अलगाववाद का ही रास्ता अख्तियार लिया है। एक भाई दूसरे के साथ रहना नहीं चाहता, बेटा बाप के साथ रहना नहीं चाहता और बाप बेटे के साथ रहना नहीं चाहता। खून के रिश्ते भी एक-दूसरे के विरोध में दुश्मनी पाले बैठे हैं, ऐसी स्थिति में दो जाति और दो धर्मों की दोहाई देना तथा एकता की बात करना मूर्खतापूर्ण और मजाकिया ही लगेगा! खैर समाजहित और देशहित के लिए ऐसी मूर्खताएं बार-बार करनी चाहिए, इसलिए कर रहे हैं। आज इन विचारों की पृष्ठभूमि में भीमा-कोरेगांव की घटना है, जिससे दो समाज और दो जातियां एक-दूसरे के सामने खड़ी हो गई, मारने-मरवाने पर उतारू हो गई। जिन दृश्यों को खबरों में देखा, समाचार पत्रों में पढ़ा उससे कई गुना भयानक दृश्य सोशल मीडिया में आग की तरह फैलते भी देखे हैं। आज भी इन दृश्यों को समाज विघातक प्रवृत्ति के लोग सोशल मीडिया में चटखारे के साथ प्रसारित करने का काम करते हैं। इन पर कोई पाबंदी नहीं? मजे लिए जा रहे हैं, आग लगाकर, तोड़-फोड़ करके, खून-खराबा करके। भयानक है। इतनी बड़ी आबादीवाले देश में इंसानी जिंदगी कीड़े-मकौड़ों जैसी बन गई है। कहानियों में पढ़ा-सूना, फिल्में में भी देखा कि एक बुरी प्रवृत्ति, बुरे इंसान को कितनी बार भी मारने की कोशिश करें मरता ही नहीं, उल्टा उस पर जितनी बार हमला करें, खत्म करने की कोशिश करें, वह उतनी ही ताकत के साथ उठ खड़ा होता है। वैसे ही भारत की भरपूर आबादी के बीच यह प्रवृत्ति एक राक्षस की तरह बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में बारुद के ढेर परखड़े होने का एहसास होता है। भारत के प्रसिद्ध वकील ऍड. उज्ज्वल निकम जी ने इसीलिए तो कहा कि अब यहां से आगे मैं जातिगत रंगोंवाले मुकदमों की पैरवी नहीं करूंगा। मेरी कोशिश रही है कि सच्चाई की जीत हो, अपराधी को सजा हो लेकिन देखा है कि पराजीत पक्ष हमेशा अपने अपराधों को नजरंदाज कर मुझे ही जातिवादी या जातिविरोधी साबित कर रहा है...एक प्रसिद्ध सरकारी वकिल का इस कदर अभिव्यक्त होना सामाजिक बिखराव और बिगड़ाव को बता देता है। सच्चे मायने में आज समाज में स्वार्थ, हिंसा, आक्रोश, दुश्मनी, अशांति, भयावता, अपराध... भरा पड़ा है। कुछ दिनों की शांति के बाद छोटीसी घटना बड़ी दुघर्टना का कारण बनती है, तो इसका एहसास बार-बार होता है कि हम लोग बारुद के ढेर पर खड़े हैं।प्रस्तुत आलेख 'रचनाकार'  के अगस्त अंक में प्रकाशित हुआ है। आगे पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें -  बारुद के ढेर पर 

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

‘फांस’ से उठता सवाल : खेती से किसान मन क्यों लगाए?



संजीव ने खोजी लेखन के तहत किसानों की जिंदगी पर केंद्रित उपन्यास लिखा है ‘फांस’। संजीव का केवल यहीं एक उपन्यास खोजी लेखन नहीं है इसके पहले के इनके ‘किसनगढ़ के अहेरी’, ‘सावधान! नीचे आग है’, ‘सर्कस’, ‘जंगल जहां शुरू होता है’, ‘सूत्रधार’, ‘रह गई दिशाएं इस पार’ आदि उपन्यास भी इसका परिचय देते हैं। संजीव के लेखन की यह भी एक ताकत है कि इन्होंने हर विचार, चिंतन और विषय को अलग से लिखा है, मतलब लेखन के भीतर पूनरावृत्ति नहीं है। जिस भी विषय पर लिखना शुरू किया उसको एक ही साथ, एक ही जगह पर पूर्णतः से लिखने की कोशिश की है। विषय का वैविध्य रहा है। समाज के भीतर की वास्वविकताओं को सबके सामने रखने का जरिया उपन्यास को बनाया है। संजीव के उपन्यास इसी कारण काल्पनिक कम और वास्वववादी अधिक है। ‘फांस’ पर लिखने से पहले संजीव के लेखन पर चंद पंक्तियों के साथ यह आरंभ है। मन और अंतरआत्मा ‘फांस’ पढ़ते वक्त हमारे दम को घोटने लगती है। व्यवस्था, वर्तमान सामाजिक जीवन, दलाल संस्कृति, बिचौलिए, बाजार, विकास, कॅशलेस संस्कृति, कालाधन, सरकार, राजनीति, कुर्सी, आदर्श, सशक्त भारत, समृद्ध भारत, महाशक्तिशाली भारत... आदि-आदि बातें, विचार हमारे आस-पास घूमने लगते हैं। हमारा देश तेजी से आगे बढ़ रहा है, सुनकर बहुत खुशी होती है।
जिस मिट्टी में हम लोग पले-बढ़े उससे गद्दारी कर अपने ही भोगों में लिप्त नवीन भारत के हम जैसे नागरिक उस मिट्टी के ऋण को भूल चुके हैं। ‘फांस’ को पढ़ते हुए हर जगह पर, हर समय लगता है कि हम अपराधी है। कानों में कर्कश आवाजें परदों को चिरती हुई कलेजे तक दर्दों को निर्माण करती है कि भाई तुम भी इस व्यवस्था के टूकड़ों पर पलनेवाला एक परजीवि जीव हो जो किसान का खून चुसने का भागीदार है। कुछ सालों पहले कहां जाता था कि भारत में अस्सी फिसदी किसान है और खेती पर निर्भरता है। परंतु वर्तमान में कहां जा रहा है कि भारत में साठ फिसदी किसान है और खेती पर निर्भरता है। सवाल यह उठता है कि अस्सी से साठ तक पहुंचना प्रगति की निशानी है या किसानी से हारकर किसानों ने खेती करना छोड़कर अपनी निर्भरता के लिए कोई दूसरा मार्ग ढूंढ़ लिया है। चितंक, ए.सी. में बैठे पॉलिसी मेकर और किसानों को अन्नदाता कहकर उसके दुःखों पर मरहमपट्टी कर मरने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करनेवाला हर शख्स कुछ भी कहे या स्पष्टीकरण दें कुछ फर्क नहीं पड़ता; वास्तव यहीं है और एक वाक्य में ही बताया जा सकता है, अब किसानों का खेती से जी भर चुका है, पेट भरने के लिए दूसरा मार्ग नहीं, अतः वे मजबूरन खेती कर रहे हैं। जिस दिन उनके लिए जीने का दूसरा रास्ता मिलेगा, आर्थिक निर्भरता का दूसरा स्रोत निर्माण होगा और पेट भरने का खेती के अलावा दूसरा विकल्प खुलेगा, उस दिन किसान खेती छोड़ देगा। अस्सी से साठ फिसदी तक आना मतलब बीस फिसदी की कटौती यही बयां करती है कि इन बीस फिसदी लोगों के लिए जिंदगी जीने के दूसरे मार्ग मिल गए हैं, खेती को छोड़ दिया, बेच दिया। किसानों के लिए खेती केवल जिंदगी जीने का मार्ग नहीं है यह उसकी आदत है और यह आदत अचानक छूट जाए तो पीड़ा होती है, तकलीफ देती है। इन बीस फिसदी किसानों ने उसे सहा है और पचाया भी है। उन्हें मलाल भी है, पर दूसरी तरफ वे सुख और शांति से यह भी कहते हैं कि भाई मैंने और मेरे पुरखों ने हजारों बरसों से गुलामी सही, अब कम-से-कम हमारी अगली पीढ़ी इस गुलामी से मुक्त हो गई।
खेती से गुलामी है, जिंदगी का मिट्टी बनना है, कर्जे में मौत मिलनी है, साहूकारों के पास जमीनों के साथ अपनी आत्मा गिरवी रखनी है, आत्मा के पानी से सींचे हरे-भरे पौधे अकाल के कारण खेती में सूख जाने हैं, बेमौसमी बारिश और तूफान से खेती के भीतर फूली-फली फसल बह जानी है, तबाह होनी है, हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद भी दो वक्त की रोटी के लिए तरसना है, दो-दो, चार-चार किलोमिटर पानी के एक घड़े के लिए भटकना है, अपने घर में गाय-भैस-बकरी होकर भी दूध के लिए तरसना है.... तो हमेशा के लिए सवाल यह उठता है कि भाई खेती में किसान मन क्यों लगाए? संजीव के ‘फांस’ को समझने के लिए किसान होना जरूरी है या किसानी से वास्ता पड़ना भी जरूरी है। हालांकि संजीव के उपन्यास का केंद्र महाराष्ट्र है; विशेषकर विदर्भ, मराठवाड़ा और खांदेश का वह हिस्सा है, जहां पर सिंचाई कम है और किसानों की आत्महत्याएं ज्यादा हो चुकी है। लगातार किसान आत्महत्याएं कर रहा है और महाराष्ट्र तथा देश के तमाम चितंक यह तय करने में लगे हैं कि हमारे प्रदेश की अपेक्षा दूसरे प्रदेशों में और राज्यों में आबादी और प्रदेश विस्तार में आंका जाए तो आत्महत्याएं ज्यादा हो रही है। मतलब नंबर एक पर कोई और है, हमारा नंबर उसके बाद का है। महाराष्ट्र में भी नरेंद्र जाधव की रिपोर्ट यहीं बताती है। आत्महत्या के कारणों में यह भी बताया गया कि खेती के लिए उठाए गए कर्जे की अपेक्षा कई अन्य कारणों से किसान अधिक आत्महत्या करता है, जैसे बेटी-बेटे की शादी का खर्चा, शराबी होना, मौज-मस्ती, बीमारी... आदि कारणों का लंबा लेखाजोखा इन विद्वानों (?) की रिपोर्टों में हैं। जैसे कोई पोस्टमार्टम करनेवाला डॉक्टर घूस लेकर रिपोर्ट बदल देता है वैसी यह रिपोर्टे। कोई विश्वसनीयता नहीं और कोई मानवीयता नहीं। इन रिपोर्ट लेखकों को पूछना चाहिए कि भाई आपने कभी शराब पी नहीं, कोई नौकरी पेशा व्यक्ति को शराब की आदत नहीं, आपने धूमधाम से अपने बच्चों की शादी नहीं की, कर्जा लेकर घर-गाड़ी नहीं खरीदी, छोटीसी बीमारी के बदले सरकारी ऑफिस से खर्चा वसूल नहीं किया, टी.ए., डी.ए. के झूठे बिल बनाकर कई बार सरकारी खजाने को लूटकर डाका नहीं डाला। सौ बहाने और सौ झूठ के बाद अपने सुखों को तलाशता नौकरशाह व्यक्ति और सौ फिसदी ईमानदारी से सेल्फ फायनांस करता भारतीय किसान स्पर्धा में कैसे टीक पाएगा? ऊपर से नौकरशाहों-पूजीपतियों को लूटने के लिए कोई है नहीं, अगर कभी लूटा भी जाए तो ऐसी कुर्सी पर बैठे हैं कि जितनी लूट हो चुकी है उससे दस गुना बहुत जल्दी वसूल कर लेते हैं। और सौ चूहें खाकर बिल्ली चली हजवाली इनकी सूरतें किसानों की आत्महत्याओं पर रिपोर्टों को लिख रही है। अगर इन कुर्सिवालों, अफसरों, नौकरशाहों, रिपोर्ट लेखकों का बस चले तो मरे हुए किसानों के शवों को आत्महत्या के अपराध मै दूबारा सजाए-मौत दे सकते हैं! आखिरकार भारत का किसान कितने सालों से कितनी बार मरता रहेगा और आगे कितनी बार मरना है?
‘भारत कृषि प्रधान देश है’ यह वाक्य बचपन से कितनी बार पढ़ा और कितनी बार सुना। यह कोई गर्व की बात नहीं है, बचपन में इसे सुनना अच्छा लगता था परंतु अब ऐसे लगता है मानो कोई इस वाक्य के साथ भद्दी-गंदी गाली दे रहा है। किसानों के लिए शोषण, लूट ही तो है। इनकी आत्महत्याओं को झूठा मानकर और सच्चाई को छिपानेवाली रिपोर्टे आएगी और छापी जाएगी। आत्महत्या इनकी कलमों से वैध्य और अवैध्य ठहराई जाएगी। पात्र और अपात्र के बीच फंसा किसान यह जान चुका है कि अपने गले में पड़े फांसी के फंदे की चिंता को छोड़कर अगली पीढ़ी को सुरक्षित करना है; अतः जैसे भी हो हमारे बच्चे किसानी नहीं करेंगे इस निष्कर्ष तक वह आ चुका है। नतीजन अस्सी से साठ फिसदी तक आना हुआ है। अर्थात् भारत के बीस फिसदी किसानों ने खेती करना छोड़ दिया है और बचे हुए बार-बार यह सवाल कर है कि आखिरकार खेती से किसान मन क्यों लगाए?
प्रस्तुत आलेख 'अपनी माटी' अप्रैल-सितंबर 2017 के अंक में प्रकाशित हुआ है। आगे पढने के लिए इस लिंक को क्लिक करें -  ‘फांस’ से उठता सवाल : खेती से किसान मन क्यों लगाए?

सोमवार, 26 जून 2017

सिनेमा की पटकथा का स्वरूप








फिल्मों के व्यावसायिक और कलात्मक नजरिए से सफल होने के लिए आधारभूत तत्त्व के नाते कथा, पटकथा और संवादों को बहुत अधिक एहमीयत है। कथा या कहानी आरंभिक तत्त्व के नाते एक सृजन प्रक्रिया होती है और इसे साहित्यकार द्वारा जाने-अनजाने अंजाम दे दिया जाता है। सृजन कार्य स्वयं के सुख के साथ समाज हित के उद्देश्य को पूरा करता है, परंतु इसका पूरा होना किसी आंतरिक प्रेरणा का फल होता है। लेकिन इन्हीं कहानियों का जब फिल्मी रूपांतर होता है तब उसका मूल फॉर्म पूरी तरीके से बदल जाता है। एक कहानी की पटकथा लिखना और फिर संवाद स्वरूप में उसे ढालना व्यावसायिक नजरिए को ध्यान में रखते हुए की गई कृत्रिम प्रक्रिया है। इसे कृत्रिम प्रक्रिया यहां पर इसलिए कह रहे हैं कि जैसे साहित्यकार कोई रचना अंतर्प्रेरणा से लिखता है वैसी प्रक्रिया पटकथा लेखन में नहीं होती है, उसे जानबूझकर अंजाम तक लेकर जाना पड़ता है। पटकथा लेखक के लिए और एक चुनौती यह होती है कि निमार्ताओं द्वारा बनाई जा रही फिल्में किसी छोटी कहानी पर बनी हो तो भी और किसी बड़े उपन्यास पर बनी हो तो भी उसे चुनिंदा प्रसंगों के साथ एक समान आकार में बनाना होता है, ताकि वह दो या ढाई घंटे की पूरी फिल्म बन सके। अर्थात् पटकथा लेखक का यह कौशल, मेहनत और कलाकारिता है, जिसके बलबूते पर वह पटकथा में पूरा उपन्यास समेट सकता है और किसी छोटी कहानी में कोई भी अतिरिक्त प्रसंग जोड़े बिना उसको पूरी फिल्म बना सकता है। फणीश्वरनाथ रेणु जी की ढाई पन्ने की कहानी ‘तीसरी कसम’ (मारे गए गुलफाम) पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ (1966) और रणजीत देसाई के उपन्यास ‘राजा रविवर्मा’ पर बनी फिल्म ‘रंगरसिया’ (2014) दोनों भी परिपूर्ण है। अर्थात् एक पटकथा का आकार कहानी से बना है और दूसरी पटकथा का आकार व्यापक उपन्यास की धरातल है। इन दोनों में भी साहित्यिक रूप से फिल्म के भीतर का रूपांतर पटकथा लेखक का कमाल माना जा सकता है। आवश्यकता भर लेना और अनावश्यक बातों को टालने का कौशल पटकथा लेखन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जिस प्रकार पटकथा का लेखन और लेखक का कमाल होता है वैसे ही निर्माता-निर्देशक की परख, पैनापन और चुनाव का भी कमाल होता है। मन्नू भंड़ारी लिखती है कि "बरसों पहले मेरी कहानी ‘यहीं सच है’ पर बासुदा (बासु चटर्जी) ने फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा तो मुझे तो इसी बात पर आश्चर्य हो रहा था कि एक लड़की के निहायत निजी आंतरिक द्वंद्व पर आधारित यह कहानी (इसीलिए जिसे मैंने भी डायरी फॉर्म में ही लिखा था) दृश्य-माध्यम में कैसे प्रस्तुत की जाएगी भला? पर बासुदा ने इस पर ‘रजनीगंधा’ (1974) नाम से फिल्म बनाई, जो बहुत लोकप्रिय ही नहीं हुई, बल्कि सिल्वर जुबली मनाकर जिसने कई पुरस्कार भी प्राप्त किए।" प्रस्तुत आलेख Research Front  ई-पत्रिका के जनवरी-मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित हुआ है। आगे पढने के लिए लिंक है -  http://www.researchfront.in/jan_march_2017/10.pdf