शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

अण्णा, मुझे जीना है

   अण्णा, मुझे जीना है

मूल मराठी कहानी - भीमराव वाघचौरे

अनुवाद - डॉ. विजय शिंदे

        मराठी के प्रसिद्ध ग्रामीण कथाकार भीमराव वाघचौरे जी की मराठी कहानी 'अण्णा, मुझे जीना है' का  अनुवाद 'लेखनी' ई-पत्रिका में अक्तूबर महिने के 'कहानी समकालीन' स्तंभ में प्रकाशित हो चुका है। प्रस्तुत कहानी भाई-बहन के बीच के गहरे रिश्ते और गरीबी से पीडित परिवार का चित्रण करती है। हिंदी के पाठकों को यह कहानी पसंद आएगी। प्रस्तुत कहानी की लिंक आगे दे रहा हूं, आप 'कहानी समकालीन' स्तंभ में इसे पढ सकते हैं। लिंक है -  LEKHNI-लेखनी

OCTOBER-2013-HINDI

 

 

लेखनी का अंक नवंबर से दिखना बंद हो जाएगा अतः पाठकों के लिए पूरी कहानी यहां पर दे रहा हूं।

 

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 औरंगाबाद से सुदाम का तार पहुंचा वैसे ही एकाएक मेरा दिल धडकने गया। थरथराते हाथों से तार के कागज को खोला। उसमें लिखा था -

  ‘‘आक्का की तबीयत और बिगड़ गई है, जल्दी आ जाओ।’’

   ऑफिस से घर आया और पत्नी को हकीकत बताई। इस खबर के लिए पहले से तैयार पत्नी ने जितना जल्दी हो सके उतने जल्दी घर के काम निपटाए। भागते-दौड़ते दोनों भी बस स्टाप तक पहुंचे। औरंगाबाद की ओर जाने के लिए तैयार बस पकडी।

       बस चल पडी और दौड़ने लगी, उसकी गति के साथ मेरे विचार भी दौड़ने लगे...। वैसे मेरी बहन आक्का दुर्भाग्यशाली! क्रूर नियति के हाथों का खिलौना। शादी क्या हुई उसके जीवन में पीडा और दुःख का अंधेरा गहराने लगा। साल, दो साल, ...पांच साल हुए। लेकिन उसके चेहरे पर खुशी देखी नहीं गई। जीवन में आनंद की फुआरे नहीं आई...। तन-मन से हार चुकी आक्का के जीवन में बच्चे का सुख शायद नहीं लिखा था और दिनों-दिन उसकी संभावनाएं भी धुंधली होती जा रही थी। खूब कोशिश की। दवा-दारू की। जिसने जो बताया वह किया और हर जगह पर दिखाया। झांड़-फूंक किया। मंदिरों में जाकर भगवान के सामने कई बार मिन्नतें भी की... उसकी सीढियों पर माथा टेका। बड़े-बड़े अस्पतालों में विद्वान डॉक्टरों को दिखाया। एक्सरें निकाले। दो बार क्युरेंटिंग किया परंतु कोई लाभ नहीं। उसके ससुराल वाले तो बेसब्री से बच्चे का इंतजार कर रहे थे। बच्चे की कमी के कारण आक्का को हमेशा अपमान, टिका-टिप्पणियां और पीडाएं सहनी पड़ रही थी। उसका पति दूसरी शादी का कब का मन बना चुका था। उनको समझा-बुझाकर आज तक जबरदस्ती रोके रखा था।

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       ...कुछ दिन पहले की बात है, ...एक दिन आक्का रोते-बिलखते घर आई! पेट के दर्द से पीडित और असहनीय वेदनाओं से कराहती हुई। बिस्तर पर पड़े-पड़े पेट को दोनों हाथों से पकड़कर तड़प रही थी। सबकुछ मुश्किल और असहनीय था उसके लिए। भीतरी नारी वेदना। किसी को बता नहीं सकते कि क्या हुआ है। उसको समझा-बुझाने के सिवाय हमारे हाथों में कुछ भी नहीं था। परंतु दर्द बढ़ते ही जा रहा था। जब उसके लिए असहनीय हुआ तो तत्काल वैजापुर के एक गायनोकॉलॉजिस्ट को दिखाया। उन्होंने भीतर-बाहर से चेकअप किया और औरंगाबाद के सरकारी अस्पताल ‘घाटी’ में लेकर जाने की सलाह दी। हम बिना समय गवाएं घाटी में आए। मेरा छोटा भाई सुदाम भी इसी शहर में था। वह भी आ गया। उसकी वजह से कई मुश्किलें आसान हो गई। दो दिनों में सारे टेस्ट करवाए गए। गर्भाशय की बायोप्सी भी की। बायोप्सी का रिपोर्ट जब तक आए तब तक आक्का को घाटी में ही रखा जाना था।

       बायोप्सी की रिपोर्ट आई और हम सब पर मानो पहाड़ टूट पडा। ...कँसर! और वह भी अपनी चरम को छू चुका था, नियंत्रण के बाहर। सुनते ही दिल बैठ गया। लगने लगा कि क्रूर काल ने मेरी बहन के साथ गंदा मजाक किया है और विषैले नाखुनों से दिल पर हजारों खरौंचें उठाकर लहुलूहान किया है। हारे हुए मन के साथ साहस जुटाया और डॉक्टर को पूछा –

       ‘‘...डॉक्टरसाहब अगर गर्भाशय को निकाला जाए तो?’’

       ‘‘...........’’

       पर नहीं। यह भी संभव नहीं था। डॉक्टर ने साफ तरीके से जवाब दे दिया था। कँसर पूरा फैल चुका है और नियंत्रण के बाहर है। गर्भाशय मुख पूरा सड़ चुका था। वाह रे तकदीर! आखिर तक आक्का को बच्चे के सुख से दूर रखा और अब उसे सडाया भी। तकदीर के खेल ने आक्का की सारी जिंदगी  तबाह कर दी थी। जलाकर राख कर दी थी। और मेरी छोटी प्यारी बहन जिंदा होकर भी लाश बन चुकी थी।

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अचानक बस के ब्रेक लगने से झटका लगा और मेरे विचारों के तार टूट गए। बाहर देखा, बस देवगांव की ओर मुड़कर रूकी थी। आधा सफर तय हुआ था। एकाध घंटे का सफर बाकी था...। पर कोई बस स्टाफ नहीं, गांव से ही दूर बस क्यों रूकी? दुबारा बाहर झांककर देखा। सामने से एक प्रेतयात्रा गुजर रही थी...। सजी हुई अरथी, कंधा देने वाले लोग, रोती-बिलखती महिलाएं, उनके पीछे चुपचाप रेंगता हुआ पुरुषों का हुजूम...। दृश्य देखकर मेरा मन अरथी पर अटक चुका। ऊपर हरीभरी साडी ढकी थी और कंगण सजे थे। तर्क किया कि जिसे लेकर जा रहे हैं वह जरूर सुहागन स्त्री है। प्रेतयात्रा आगे सरकी और बस दुबारा शुरू हुई। खिड़की से झांकते हुए एक संवारी ने इतनी देर से रोके रखी सांस को छोड़ते हुए कहा – 

       ‘‘कुछ भरौसा नही इंसान की जिंदगी का! केवल पानी पर उठा बुलबुला है। कब फुटेगा बताया नहीं जा सकता...। इसीलिए तो संत तुकाराम कह गए कि ’देह नष्ट होने वाली है और एक दिन सबको इस दुनिया को छोड़कर जाना है...।’’

       बातचीत का सिलसिला जारी रहा। ईश्वर, नसीब... और अनेक विषयों पर बातें होने लगी। मेरा बन इन बातों से उड़ गया। अरथी और अरथी पर सजी हरी साडी का दृश्य मेरी आंखों के सामने से हटने का नाम नहीं ले रहा था। मन की व्याकुलता बढ़ती गई और वह अंदर ही अंदर आक्रोश करने लगा। आक्का की तबीयत कैसी होगी? क्या होगा? और कौनसी खबर सुननी पडेगी...। आतंक और चिंता बढ़ती जा रही थी।

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       आक्का मुझसे भी छोटी थी परंतु मेरे लिए उसने बहुत सहा था। मैं उसकी मेहनत और त्याग की वापसी कभी भी नहीं कर सकता हूं। आज मैं जिस मकाम पर हूं वह केवल उसकी बदौलत है। मेरे लिए उसने मजदूरी की, अभाव सहे और पसीना बहाया। ...उससे जुड़ी कई यादें मन की तह से ऊपर उठ रही थी। एक के बाद एक घटनाएं आंखों के सामने से गुजर रही थी।

       बहत्तर-चौहत्तर के सूखे की घटनाएं हैं। सूखे की मार से चारों और विरानता फैल चुकी थी। आम आदमी दाने-दाने के लिए मोहताज था। लोगों के मन में भी विरानता, दुःख, पीडा फैल चुकी थी। जिंदा रहने के लिए लोग गांव-गांव और जंगल-जंगल भटक रहे थे। अपना गांव-घर छोड़कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए इंसान मजबूर था। अपनी भूमि से गहराई तक जुड़ी मन की जड़े उखाड़ते वक्त मन को असंख्य वेदनाएं हो रही थी। ...मेरे पिता जी के ऊपर सात बच्चे और दादी मां का बोझ था। सूखे से आस-पास के इलाखे की सारी खेती-बाडी तबाह हो गई थी, मजदूरी का भी काम नहीं मिल रहा था। सबके खाली पेट। जो था उसे बेच-बाचकर खा चुके थे। अब बेचने के लिए भी कुछ बाकी नहीं था। एक समय जलने वाली चूल्हे की आग भी ठंडी पड़ चुकी थी। गरीबी और सूखे से हाथ बंध चुके थे। क्या करे, क्या नहीं करे समझ में नहीं आ रहा था। पिताजी और हमारा परिवार काल के विक्राल हाथों से चारों ओर से घिर चुका था।

       गांव छोड़कर जाए तो यहां बचा-खुचा किसके भरौसे छोडे? अगर गांव छोड़े भी तो यहां दादी के साथ रहेगा कौन और खाए क्या? चिंता सता रही थी। बुरे दिनों में कोई किसी का नहीं होता। घर छोडे तो आंगन भी पराया हो जाता है। मेरे पढ़ाई की चिंता पिता जी को सता रही थी। दादी के पास रहने के लिए पढ़ाई को रोकना उन्हें मंजूर नहीं था। अपनी भूख, पेट, अभाव और चिंताओं से उन्हें मेरी पढ़ाई जरूरी लग रही थी। दिनों-दिन मुश्किलें बढ़ती जा रही थी। घर की बुरी हालत को देखकर मुझसे छोटी आक्का ने कमर कसी और सबकी हिम्मत बांधते पिता जी से कहा –

       ‘‘...आप्पा अब एक ही रास्ता है। आप सभी जहां काम और रोटी मिले वहां जाए। अण्णा की पढ़ाई को जारी रखे और मैं यहीं रूककर जैसा बने वैसे दादी की देखभाल करूंगी...। आप बेफिक्र होकर जाए।’’

       और हुआ भी वैसे ही। मेरी पढ़ाई जारी रही। पिता जी ने जरूरी सामान उठाया। परिवार के साथ दूर कहीं सालदार के नाते मजदूरी के लिए निकल पड़े। मैं बीच-बीच में आक्का और दादी की ओर एकाध बार चक्कर लगा लेता। मेरी पढ़ाई परिवार के भविष्य का आधार थी, अतः मेरे आने-जाने से सूखे की विरानता में उनके चेहरे पर आशा की थोडी-सी हरियाली फैल जाती थी। मैं भी उनके सपनों को जिंदा रखने की भरसक कोशिश कर रहा था।

       आज भी मुझे याद है, स्कूल को छुट्टी थी। कोई त्यौहार था और मैंने सोचा चलो एक-दो दिन घर होकर आता हूं। इस बहाने मिलना भी होगा, आक्का और दादी का क्या चल रहा है देखना भी होगा। घर आते-आते अंधेरा घिर चुका था। खाने का समय भी टल चुका था। ...मुझे देखते ही आक्का हैरान हो गई। आज त्यौहार है इसलिए मैं गांव आया हूं, यह आक्का ने पहचान लिया। मैंने कुछ खाया नहीं जानते ही उसने बेचैनी से कहा –

       ‘‘अण्णा, बाहर कहीं मत जाओ, मैं अभी आयी...।’’ वह जल्दबाजी में बाहर गई। मैं दादी के पास बैठा और वह गांव-घर की हालत, लेन-देन, सुख-दुःख की कहानी बताती रही...। इतने में दरवाजे पर आक्का के कदमों की आहट सुनाई पडी। टिमटिमते दिए के रोशनी में मैंने देखा कि पडोस से बचा-खुचा पल्लू में छिपाकर लाया वह टोकरी में रख रही थी। अपने अभाव, दुःख, दर्द को छिपाते ममता भरे शब्दों में उसने कहा –

       ‘‘चलो उठो अण्णा। थोडा-सा रूखा-सूखा है खा लो। सुबह से खाली पेट रहे हो। बहुत देर हो गई है, ...चलो खा लो।’’

       दिल भर आया था, मन पर पत्थर रखकर आगे सरका। एक-एक कौर मुंह में डाले जा रहा था। थाली में रूखा-सूखा था, किसी के घर का बचा हुआ...। आक्का ने केवल मेरे लिए मांगकर लाया था...। इस हालत, दयनीयता और आक्का के असिम प्रेम में डूबकर निवाला गले से उतर नहीं रहा था पर आक्का-दादी की खुशी के लिए खाए जा रहा था। आंखों से टपकने वाले आंसुओं को अंधेरे में छिपाते हुए निवाले को और नमकीन बनाते हुए नीचे धकेल रहा था। पेट की भूख कम होना दूर रहा पर यह स्थिति दुःख-दाह को और बढा रही थी, मन भीतर से आक्रोश किए जा रहा था...। जैसे-तैसे खाना पूरा किया, उठा और बाहर जाकर अंधेरे में खडे होकर आसुओं को बहने दिया। कहां जाए? क्या करे? ...सीधे घर के छत पर चढा, दीवार से सर टिकाकर भर आए मन को और हल्का किया। आंखों से होकर मन की वेदनाओं को बाहर आने दिया, बहुत देर तक।

       आक्का से जुडी ऐसी एक नहीं कई घटनाओं की यादें आज ताजा हो रही थी। मन के बंद कटघरे को तोड़कर बाहर आ रही थी...। कुछ समय और काल के लिए आक्का ने मां होकर मुझे पालापोसा था।

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       औरंगाबाद के बस स्टाफ पर हम उतरे और सीधे सुदाम के कमरे का रास्ता पकड़ लिया। मैं आगे-आगे भाग रहा था और पत्नी पीछे-पीछे। दोनों के बीच मौन था। भीड़ से रास्ता निकालते हम अपने-आपको धकेले जा रहे थे। हमारे लिए मानो समय ठहर चुका था, भाव-भावनाएं मुक बनी थी...। रास्ते को तय करते वक्त मन में एक भय की छाया मंड़रा रही थी। सुदाम का कमरा जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था तब हाथ-पांव आतंक से थरथराने लगे थे। रह-रहकर बुरे खयाल आ रहे थे, बुरे दृश्य आंखों से गुजर रहे थे...। अब आक्का ठीक तो होगी? कैसी हालत होगी? और कोई उल्टी-सीधी खबर तो कानों पर पडेगी नहीं ना? एक नहीं हजारों खयाल।

       इसी धुन और विचारों में कब पहुंचा पता ही नहीं चला। पैरों से लिपटे सुदाम के बच्चे की आवाज कानों पर पडी, ‘‘चाचा आए, चाचा आए...।’’ उसे प्यार से पुचकारते हुए हाथ पकड़कर बरामदा पार किया। दरवाजें पर कुछ चप्पलें बिखरी पडी थी...। बढ़ती धड़कनों के साथ अंदर दाखिल हुआ। सबकी नजरे मेरी ओर उठी। आक्का का पति, सास, सुदाम की पत्नी और एक-दो दूसरी महिलाएं वहां बैठी थी...। सबके बीच आक्का के हड्डियों का पिंजर बिस्तर पर पडा था। सारे कमरे पर भयानक छाया मंड़राने का एहसास हो रहा था...।

        आक्का की इस दशा को देखकर मेरा मन क्रंदन करने लगा था। बडी मुश्किल से दिल पर पत्थर रख रूदन को रोके रखा था। कारण यहां आक्का की सास के अलावा उमर से मैं ही सबसे बढा था...। सुनी आंखों से बिस्तर पर पडी आक्का पर नजर दौडाते हुए, फर्श का आधार लेकर वहीं बैठ गया। मेरे बैठते ही सुदाम की पत्नी ने आक्का को थोडा हिलाकर जगाया और मेरे आने की सूचना देनी चाही –

       ‘‘आक्का, आक्का जी... देखो जरा आंखें खोलकर कौन आया है! उठिए! देखिए। अण्णा आए हैं, साथ में आपसे मिलने के लिए भाभी जी आयी है। उठे। थोडी बात कर लिजिए इनके साथ...।’’

       आवाज सुनते ही बंद खांचों में आंखें थोडी हिली। जबरदस्ती आंखें खोलकर आक्का ने हम पर नजर दौडाकर पहचानने की कोशिश की। पहचान होने पर कुछ बोलने के लिए उसके सूखे होंठ थरथराने लगे। होंठों को खोलते वक्त भी उसे तकलीफ हो रही थी। लंबी वेदना के साथ उसकी कराह फूटी ...और लगातार सिसकने लगी। मेरे कानों पर उसकी दर्द से भरी सिसकियां पड रही थी लगता था कि कहीं दूर कोई दर्द से, पीडा से कराह रहा हो। सिसकियों से उसका सारा शरीर कांपने लगा। उसकी इस पीडादायी दशा को देखकर मेरे मन को हजारों दरारें पडी और इतनी देर से रोके रखे आंसू अचानक बांध तोड़कर बहने लगे। ...सबकी आंखें भी भर आई। कमरे का सारा माहौल सिसकियों और रूदन से भर गया। बुजुर्ग होने के नाते आक्का की सांस ने सबका साहस बांधा और समझा-बुझाकर चुप करने लगी।

       ‘‘...बस, बहुत हो गया। उसके लिए बहुत किया है अण्णा आप सबने। उसे ठीक करने के लिए पानी की तरह पैसा बहायाहै, ...वह ठीक हो जाएगी। ऊपर वाले की मर्जी हो तो चार दिनों में चले-फिरने लगेगी...।’’

       आक्का की तकलीफ मुझसे देखी नहीं जा रही थी। बहते आसुओं को पोछते-पोछते बाहर आया। जीजा जी से भी उसकी तकलीफ देखी नहीं जा रही थी, वे भी उठकर बाहर आ गए। दोनों भी बरामदे में जाकर बैठे। दोनों ओर बहुत देर तक चुप्पी छाई रही। पर मैं और चुप नहीं बैठ सका। गुस्सा, क्रोध और आक्रोश चुपचाप पीकर मन को समझाना था... कारण नियति ने जो तय किया था उससे कोई भाग नहीं सकता था। हां केवल कुछ दिनों के लिए टाला जा सकता था...। चुप्पी तोड़ने के लिए मैंने कहा –

       ‘‘आपको कब खबर मिली...?’’

       ‘‘आज ही...। यह बात भी दो-तीन जनों से होकर हम तक पहुंची थी। पर सच कहूं अब लगता है सुदाम ने बेवजह जल्दबाजी की। हाथों के सारे काम छोड़कर आना पडा। और यहां पर वैसी गंभीर स्थिति है नहीं...।’’

       ‘‘क्या कह रहे हैं जीजा जी? गंभीर स्थिति नहीं? कैसे कह सकते हैं? अब क्या बचा है उसमें? बोलने की शक्ति नहीं है? वह क्या बोल रही है यह भी समझ में नहीं आता है।’’

       ‘‘आप जो कह रहे हैं वैसे बिल्कुल नहीं है! अब आपको कैसे बताऊ! हम जब आए थे तब वह अच्छी-खांसी थी। खुद उठकर घंटाभर बैठी थी। बहुत देर तक हमसे बतियाते भी रही। लेकिन एक बात सच है अण्णा, आप कुछ भी कहे, उसके मन में अब भी गृहस्थी की आशा बाकी है! मुझे लगता है उसे ऐसी बीमारी में खाना-पीना चाहिए, आराम करना चाहिए। पर उसकी जान तो घर-गृहस्थी में अटक चुकी है। वहां क्या चल रहा है, गाय को बछडा हुआ या नहीं, क्या हुआ उसे। बछडा अगर बैल हो तो उसको खुब दूध पिलाओ। उसका ध्यान रखो... और बहुत कुछ...।’’

       जीजा जी निर्दयता से बोल रहे थे और मैं केवल सुनते हुए विचार करते जा रहा था...। मेरे दिमाग में एक ही बात बार-बार उठ रही थी – आक्का के अधूरे जीवन की। मन के अधूरेपन की। अतृप्त मातृत्व की...। सोच ही रहा था कि सुदाम के बीवी की आवाज कानों पर पडी –

       ‘‘अब आक्का उठकर थोडी बैठी है। आप उनसे थोडी बात कर लें।’’

       अंदर गया तो देखा आक्का दीवार से चिपककर बैठी थी। मनुष्य शरीर के नाते कुछ भी शेष नहीं था। एकाध चित्र जैसे दीवार को चिपाकाया जाता है वैसे वह चिपककर बैठी थी। सुनी आंखें, चेहरे की सारी चमक गायब थी और सूख चुकी, गल चुकी चमडी। लग रहा था मानो उसे हड्डी के साथ चिपकाया हो। उसका चेहरा अंदर से पूरी तरह सूख चुका था और आंखों के नीचे की हड्डियां ऊपर उठ चुकी थी। गली-सूखी उंगलियां सामने रखी मिठाई का छोटा टूकडा उठाकर मुंह में जबरदस्ती ठूंस रही थी...। उसके पास बैठते हुए कंधे पर हाथ रखते प्यार से परंतु कातर स्वर में पूछा –

       ‘‘क्यों, आक्का अब तुम्हें ठीक लग रहा है ना? कहां-कहां दर्द हो रहा है अब?’’

       किसी गहरे-अंधेरे कुएं से जैसी आवाज आती है वैसे कुछ शब्द गुंजते हुए बाहर निकले –

       ‘‘अब, क्या क्या हो रहा है और कहां-कहां दर्द हो रहा है, कैसे बताऊं तुम्हें... लग रहा है मानो मेरा सबकुछ खत्म हो चुका है...।’’

       इतना कहते-कहते उसकी अंदर धंसी हुई आंखों में आंसू भरने लगे। अज्ञात में खोई हुई उसकी आंखें दूर कहीं कुछ ढूंढ़ रही थी। हड्डियों के ढांचे में थोडी जान आ गई और उसका शरीर हिलने लगा। लंबा हाथ थरथराते हुए उठकर पेट की ओर गया। दर्द-पीडा की लकिरें उसके चेहरे पर उठती गई। कराह और असहनीय वेदनाएं चेहरे पर दिखने लगी। पीडा से व्याकुल होकर कराहते-कराहते आक्का बिस्तर पर फैलती गई...।

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       काम से बाहर गया सुदाम घर वापस आया था। उससे बातें हो गई। आक्का की बीमारी से उसके लिए भी कई मुश्किलें खडी हो गई थी। उसके शब्दों में शिकायत भरी थी। बात ही करते बैठे थे कि अंदर से उसके पत्नी ने आवाज दी –

       ‘‘खाना बना लिया है। मेहमानों ने भी खाना नहीं खाया। सब मिलकर थोडा-थोडा खा लें।’’

       खाने का मन तो था नहीं पर जीजा जी के साथ बैठ गए। सुदाम को समझाते रहा और जीजा जी से बात करते दो-चार कौर पेट में धकेल दिए।

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यहां आकर बहुत देर हो चुकी थी। चार-साढे चार बज रहे थे। वापस लौटना भी जरूरी था। सुबह निकलते वक्त ऑफिस में केवल एक ही दिन के छुट्टी की अर्जी छोड़ आया था। पत्नी को वापस जाना जरूरी है बता दिया। निकलने की तैयारी शुरू हो गई। निकलने से पहले आक्का से दुबारा बात करने की मंशा से थोडा हिलाकर जगाना चाहा। गर्दन के नीचे थोडा आधार देकर उसे बिठा दिया। मैं भी वहीं बिस्तर पर टिका। रूखे-सूखे, बिखरे बालों पर से हाथ फिराकर डबड़बाई आंखों से देखा और कहा –

‘‘निकल रहा हूं आक्का...।’’

रूमाल मुंह में दबाकर रूदन को रोके रखा। असहनीय हुआ तो उठकर बाहर आया...। दीवार की ओट में हताशा से बैठकर अंदर की आवाजें सुनता रहा। मेरी पत्नी कह रही थी –

‘‘आक्का जी इजाजत दीजिए हमें अभी। ज्यादा कुछ सोचे मत। दवाइयां ठीक समय पर लेते रहें। आप जल्दी ठीक हो जाएंगी...।’’

आक्का ने उत्तर में कुछ कहा नहीं। वह चुप थी। बैठे-बैठे केवल वेदना से कराह रही थी।

निकले से पहले सुदाम की पत्नी पूजा की थाली में कुंकम लेकर आई। मेरी पत्नी और उसने हल्दी-कुंकम एक-दूसरे के माथे पर लगाया। आंसू भरे आंखों से उन दोनों ने आक्का को दुबार आंखें भरकर देखा। उन्होंने मिलकर सुहागन की निशानी के नाते आक्का के माथे पर भी हल्दी-कुंकम लगाया पर कमजोरी के कारण उसकी गर्दन हिलने लगी थी और माथे पर लगाया जा रहा तिलक इधर-उधर फैलते जा रहा था। कुंकम तिलक उसके सुहागन होने की बात को और गहराई से अंकित किए जा रहा था परंतु उसके गाढे रंगो तले उसकी भाग्यरेखा धुंधलाते जा रही थी...। और मैं खुली आंखों से सबकुछ देखने के लिए मजबूर था। मन में उबलता आक्रोश फूटने के लिए उतारू था पर उसे जबरदस्ती रोके रखा था।

...मेरी आंखों के सामने जो खेलते-कुदते धीरे-धीरे बढी हो गई थी, छोटी होकर भी मुश्किल समय में जिसने कभी घर का आधार बनने के लिए कमर कसी थी, उसे आज दयनीय अवस्था में टूटते-बिखरते देख रहा था। बीमारी से गलते भी देख रहा था, उसका छोटा और छोटा होते जाना भी देख रहा था। ‘बच्चे की मां’ होना तो उसके नसीब में नहीं लिखा था लेकिन आज उसका ‘बच्चा’ होना देख रहा था। किसी अपने का, आत्मीय का इस तरह तिल-तिल घटते जाना, मृत्यु के नजदीक पहुंचना मेरे लिए दर्दनाक था...। काल की भयानकता के सामने मैं निहत्था खडा था। हाथ पर हाथ धरे बैठने के सिवा मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था। नियति की क्रूरता के सामने मैं मजबूर और हताश था...।

दुःख के विशाल और विस्तीर्ण महासागर में मुझे अकेला छोड़ अनंत में विलिन होने की आक्का तैयारी कर रही थी...। लेकिन इस अथाह दुःख को भी एक समाधान की झालर थी कि मेरी आक्का चिरंतन सुहागन के रूप में मृत्यु का वरण करने वाली थी...।

हाथ में थैली उठाकर पत्नी बाहर निकल पडी और मैं भी आक्का को पीछे छोड़ बोझिल कदमों से चल पडा। मेरी आत्मीय प्यारी बहन आक्का पीछे जोर-जोर से मानो आक्रोश कर चिल्ला रही थी, ‘‘...आण्णा, मुझे जीना है, ...अण्णा, मुझे जीना है...!’’

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