भारतीय सिनेमा के जनक के नाते दादासाहब फालके के
नाम का जिक्र होता है और उनकी पहली फिल्म और भारतीय सिनेमा जगत् की पहली फिल्म
‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) को लेकर भी कुछ बातों पर प्रकाश डाला है। यहां पर उनके
योगदान पर संक्षिप्त दृष्टि डालना जरूरी है उसका कारण यह है कि आज भारतीय सिनेमा
जिनकी पहल का परिणाम है वह जिन हालातों से गुजरा, उसने जो योगदान दिया उसका ऋणी
है। सिनेमा को लेकर उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों का संक्षिप्त परिचय होना सिनेमा
के पाठक को जरूरी है। दादासाहब फालके जी की कदमों पर कदम रखकर आगे भारतीय सिनेमा
बढ़ा और करोड़ों की छलांगे भरने लगा है। अमीर खान, सलमान खान, शाहरूख खान के बीच
चलती नंबर वन की लड़ाई या इनके साथ तमाम अभिनेता और निर्माताओं की झोली में
समानेवाले करोड़ों के रुपयों में से प्रत्येक रुपैया दादासाहब जैसे कई सिनेमाई
फकिरों का योगदान है। अतः तमाम चर्चाओं, विवादों, प्रशंसाओं, गॉसिपों के चलते इस
इंडस्ट्री के प्रत्येक सदस्य को सामाजिक दायित्व के साथ सिनेमाई दायित्व के प्रति
भी सजग होना चाहिए। अगले एक मुद्दे में सौ करोड़ी क्लब पर प्रकाश डाला है, परंतु
इससे यह साबित होता नहीं कि वह फिल्म भारतीय सिनेमा का मानक हो। फिल्म इंडस्ट्री
में काम करनेवाला प्रत्येक सदस्य याद रखें कि हमारे जाने के बाद हमने कौनसे कदम
ऐसे उठाए हैं, जिसकी आहट लंबे समय तक सुनाई देगी और छाप बनी है। अपनी आत्मा आहट
सुन न सकी और छाप नहीं देख सकी तो सौ करोड़ी कल्ब में दर्ज किए अपने सिनेमा का
मूल्य छदाम भी नहीं होगा। भारतीय सिनेमा के इतिहास में क्लासिकल और समांतर सिनेमा
का एक दौर भी आया जो उसकी अद्भुत उड़ान को बयां करता है। इन फिल्मों के निर्माण में
कोई व्यावसायिक कसौटी थी नहीं केवल लगन, मेहनत, कलाकारिता, अभिनय, संगीत, शब्द,
गीत, विषय, तकनीक, सादगी, गंभीरता... की उत्कृष्टता थी, जो सच्चे मायने में सिनेमा
के जनक को सलाम था और उनके द्वारा तैयार रास्ते पर चलने की तपस्या थी। हाल ही के
वर्षों में बनती कुछ फिल्मों को छोड़ दे तो केवल व्यावसायिता, सतही प्रदर्शन, सस्ते
मनोंरंजन के अलावा कुछ नहीं है कहते हुए बड़ा दर्द होता है...। प्रस्तुत आलेख 'रचनाकार' ई पत्रिका में प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक है - दादासाहब फालके : भारतीय सिनेमा के जनक
मेरे ब्लॉग पर स्वलिखित हिंदी भाषा की रचनाएं हैं, जिसमें समीक्षात्मक आलेख, लेख,अनुवाद और सृजनात्मक रचनाएं हैं। साथ ही इस ब्लॉग पर ई पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य के लिंक भी मौजूद है। आप रचनाओं को पढने के लिए दाएं 'रचनाएं' में जाकर मनपसंद विधा को क्लिक करें। सीधे ब्लॉग पर वह रचना या उसकी लिंक आएगी। लिंक पर दुबारा क्लिक करने पर मूल ई-पत्रिका में प्रकाशित रचना तक आप पहुंच सकते हैं।
गुरुवार, 21 जनवरी 2016
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015
फिल्मी अदाकारों को पुनर्निर्माण का आवाहन करती कहानी ‘मोहन दास’
भारत युवकों का देश है। सबसे ज्यादा युवक भारत
में हैं; अतः इनके बल पर भविष्य के भारत की कल्पना की जाती है। भारत के महाशक्ति
बनने की कल्पना भी की जा रही है। भविष्य में भारत महाशक्ति बनेगा पर कितने सालों
में इसका भरौसा नहीं। भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 2020 का समय एक
चर्चा के दौरान बताया था। लेकिन आज हम जिन स्थितियों में हैं वहां तो यह संभावनाएं
नहीं दिख रही है कि भारत 2020 तक महाशक्ति का सरताज अपने सर पहने। इस लेख में
भारतीय महासत्ता या विकास की गति का आकलन करना मेरा उद्देश्य नहीं है, मेरा
उद्देश्य यह है कि भारत के पूर्ण विकास और शक्तिमान बनने के पूर्व और बनने के बाद
क्या हमारे देश के युवक सुखी होंगे? समाधानी होंगे? सबके हाथों को काम मिलेगा?
गरीबी दूर होगी? भ्रष्ट्राचार खत्म होगा? नौकरशाहों की दादागिरी खत्म होगी? देश की
पुलिस समाजहित के लिए काम करेगी? भारतीय गांवों का दृश्य बदलेगा? शिक्षितों कि
शिक्षा का उचित मूल्य होगा? शिक्षा व्यवस्था के ढांचे को
बदला जाएगा? विद्यार्थियों पर शिक्षा के माध्यम से किए जाने वाले प्रयोग बंद
होंगे? और एक स्थायी, ठोस शिक्षा व्यवस्था बनेगी?
अपने आस-पास को जब हम देखते हैं तब कई लोग चिंताओं
में घिरे नजर आते हैं। सबकी चिंता हम पकड़ पाए या न पाए पता नहीं पर जो दिखता है वह
भयानक है। एक वर्ग वह है जो कहीं न कहीं कोई नौकरी कर रहा है, महीने-दर-महीने उसके
घर में पैसे आ रहे हैं। कोई उद्योग-व्यापार कर रहा है, छोटा-बढ़ा ही पर कर रहा है
और उसके पास पैसे आ रहे हैं। अर्थात् जिनके पास किसी-न-किसी रूप में पैसे आ रहे
हैं उनकी जिंदगी का गुजर-बसर हो रहा है। इन्हें शायद ही कोई शिकायत रहती है, अपने
आस-पास की कमियों के लिए। अगर शिकायत रही भी तो वह उग्र-विद्रोहकारी नहीं होते, बस
स्वर रहेगा शिकायत का। दूसरा वर्ग वह है जिन्हें रोज अपनी रोटी के लिए मेहनत करनी
पड़ती है, पानी पीने के लिए रोज कुआं खोदना पड़ता है। अभावों से भरी जिंदगी, रोज की
लड़ाई और संघर्ष के चलते दुनिया की ओर आस लगाए बैठे हैं, हाथ के लिए कुछ काम मिलेगा
इसलिए। बेईमानी की रोटी ये खाना नहीं चाहते और अपने देश में इन्हें ईमानदारी से
रोटी कोई खाने देता नहीं। क्या करें? किसी तरह जिंदगी घसिटती जा रही है। हजारों
गालियां खाकर, अपमान सहकर, दयनीयता और पीड़ाओं का घुंट पीकर पेट के लिए, जिंदगी की
ज्योत जलाए रखने के लिए सब सह रहे हैं। इनके भी परिवार हैं, बीवी-बच्चे हैं। कैसे
रह रहे हैं? कैसे पढ़ रहे हैं? पढ़ने के बाद क्या करेंगे? क्या मिलेगा?
यह अंश मेरे नए आलेख का है। यह आलेख उदयप्रकाश की लंबी कहानी 'मोहनदास' और उस पर बनी फिल्म पर केंद्रित है। पूरा आलेख अपनी माटी में प्रकाशित हुआ है उसकी लिंक आगे दे रहा हू सिनेमा : फिल्मी अदाकारों को पुनर्निर्माण का आवाहन करती कहानी 'मोहनदास'
बुधवार, 1 अप्रैल 2015
किसान : सौत का बेटा
सरकारें
बदली, पार्टियां बदली पर देशी किसान के हालत नहीं बदल रहे हैं। आए दिन और
एक आत्महत्या की खबरें आ रही है। करें भी तो क्या करें, यह सिलसिला कब
रूकेगा? कहां रूकेगा? या युं ही हमारे देश का किसान मरता रहेगा? प्रश्न यह
उठता है कि इसे मरना कैसे कहां जाए? इसे आत्महत्या कैसे कहे?... यह तो
हत्याएं है! यह तो खून है जो दिन दहाड़े हमारे देश के किसानों का हो रहा है।
‘खेती हमारे देश का आधार है’ कितना सपाट और असंवेदनशील वाक्य है। हजारों ने
लाखों बार लिखा, उच्चारित किया।
हमने शेखचिल्ली की कहानी बचपन में
पड़ी थी जिसमें वह जिस डाल को काटना चाह रहा है उस पर ही बैठकर कुल्हाड़ी
चला रहा है। अब हमें नहीं लगता कि देश का आधार बनी खेती और किसानी को हम
कटवाने पर तुले हैं? वास्तविकता यह है कि हमारे देश में किसान अब खेती नहीं
करना चाहता है। उसके सामने विकल्प उपलब्ध नहीं इसलिए वह मजबूरी में खेती
कर रहा है। उसे अगर पूछे कि तुम अपने बच्चों को और अगली पीढ़ी को क्या
बनाओगे तो वह साफ शब्दों में कहेगा कि किसानी छोड़कर उसे मैं कुछ भी
बनाऊंगा। किसानों की यह मंशाएं वास्तविकता में उतर रही है।
यह आलेख रचनाकार ई-पत्रिका में प्रकाशित है। राजनीतिक और लोकतत्र की उपेक्षा सहते किसानी पर प्रकाश डालनेवाला पूरा आलेख पढने के लिए लिंक दे रहा हूं - आगे पढ़ें: रचनाकार: विजय शिंदे का आलेख - किसान : सौत का बेटा
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